उड़ना चाहती थी आसमान के तले।
कहा था पिता से अभी है पढ़ना, शादी नहीं है करना।
पिता ने समाज का बहाना बनाया।
रोती रही वो ज़ार-ज़ार कहती रही
मन हमारा ये कहता रिश्ता नहीं ये सच्चा।
दहेज के लोभियों से पिता हमें बचा लें।
माँ के आंचल में आंसुओं से समझाई।
कहती रही बार-बार मत छीनो बचपन,
भाइयों से कहा राखी का फर्ज निभा दे,
सुन लो मेरी विनती कोई तो हमें बचा लो।

दे समाज की दुहाई शादी उसकी रचाई।
पति से उसने बोला तन मन करूं समर्पण
तुम लाज मेरी रखना मन आहत न करना।

सासु से जाकर बोली लक्ष्मी बन रहूँगी कर्म से न हटूंगी।
हर रिश्ते का सम्मान करूँगी बस मान मेरी रखना।

पर किसी ने माना न उसका कहना।
कहा सास ने समझा कर यह रीत है पुरानी।
साहस और समझदारी यहाँ काम नहीं आनी।
यह घर नहीं तुम्हारा तूं है यहाँ की नौकरानी।

पति ने कहा रखना हमेशा ही हमें इस पचड़े से दूर।
विश्वास खुद पर है तो बन इस घर के लायक।

सासु माँ  का कहना बहू तुम  सबसे पहले उठना,
इस घर की जिम्मेदारी तन मन से निभाना।

करती रही हर काम, कर दिया खुद को समर्पित।
दिन महीने बिते पूरे हुए साल।
बढ़ने लगी जिम्मेदारियों के भार।

हर रोज की अलग फरमाइशें। 
दहेज लोभियों के बढ़ने लगी आकांक्षाएं।
खटती रही दिनभर सुनती रही ताने।

माता पिता ने भी अपने हाथ पीछे कर ली।
कहा घर बार तेरा है अब तू ही इसे संभाल।
हर घर का यही हाल बढ़ने लगे अत्याचार।

ताने के साथ गाली गलौज और मार।
गया सब्र का बाँध टूट,
लगने लगी मौत जिंदगी से बेहतर।
न था सुनने को पति राजी,
न माता-पिता का सहारा।
जगाया उसने अपने अंदर का विश्वास।
लिया उसने फैसला पंछी बन गगन में उसे उड़ना।
न सहेगी किसी का वो जुल्म  अत्याचार।
संघर्षरत होकर उसने किया फिर से शुरू पढ़ना।

पढ़ती रही संग-संग जॉब करती रही।
छोड़कर घर बार तोड़ा हर रिश्ते  से नाता।
खुद की अलग पहचान उसने बना ली।

एक आशियाना प्यारा सा उसने बनाया।
कदम धरती पर टिकने लगे ।
मन आसमान में पंछी बन उड़ने लगे।
देखकर साहस और समझदारी ,
सारे अपने भी नजदीक आने लगे।

इस रचना के माध्यम से हम यही कहना चाहते हैं  
किसी परिस्थितियों से घबराकर दुनियां छोड़ने से बेहतर उस रिश्ते  को छोड़ दिया जाए।
            अम्बिका झा ✍️