आज जब भी मैं काॅफी का प्याला हाथ में लेती हूं।
पुरानी यादों के बवंडर घेर लेते हैं,
वो कालेज का जमाना याद आता है,
एक बार सखियों संग काॅफी पीने गए थे,
तब जन्मदिन मनाने का सबसे आसान तरीका था,
सखियों को काॅफी पिलाओ मस्ती कर जन्मदिन मनाओ!!
कालेज के पास इक छोटी सी चाय की दुकान थी,
हमने वहां जाकर उससे कहा काॅफी पिलाओ!?
वह मासूम सा लड़का पहले देखता रहा,
फिर बहुत अदब से बोला बैठिए हम लाते हैं।
थोड़ी देर में ही काॅपी का प्याला हमारी मेज पर था।
आप पीकर बताइए पहली बार काॅफी बनाई है।
काॅफी का प्याला हमनें होंठों से लगाया।
उस काॅफी में एक अनोखा स्वाद आया।
हमने पूछा यह काॅफी कैसे बनाई है?
इस काॅफी में तुमने क्या डाला?
इस काॅफी का स्वाद है निराला!!
वह हौले से मुस्कुराया, फिर धीरे से बताया।
ग्राहक हमारे लिए भगवान है,
मैंने श्रद्धा इसमें मिलाई तब यह काॅफी है बनाई।
फिर हम हर रोज वहां जाने लगे।
कालेज का जमाना बीत गया।
फिर वहां जाना छूट गया,
फिर वर्षों बाद एक बार वहां से गुज़रे।
अब वहां वह छोटी सी दुकान नहीं,
बड़ा भव्य काॅफी हाउस था,
नज़रें उधर उठीं क़दम उधर बढ़े।
अंदर जाकर जब वहां देखा!!
चारों ओर खुशियों का था नज़ारा !!
मैं जैसे ही वहां बैठी, मेरी नज़रें रहीं किसी को ढूंढती।
तब वेटर ने आकर कहा,मैडम क्या लेंगी?
ब्लैक काॅफी लाऊं,या हाट मंगवाऊं?
आपको कोल्ड पसंद है या कुछ और मंगाऊं?
तभी पीछे से आवाज आई,
इन्हें प्यार की काॅफी पिलाओ?
यह मेरी दीदी हैं इन्हें ग्राहकों की तरह न बहलाओ?
यह सुनकर मन में श्रद्धा के भाव आए!
हाथों में काॅफी का प्याला, होंठों पे मुस्कान, चेहरे पर खुशियों के रंग छाए।।
डॉ कंचन शुक्ला
स्वरचित मौलिक