आज यादों के समन्दर में डुबकी लगाई है, 
यादें आज उस किनारे से इस किनारे आई है, 
वैसे यादों की बारात तो रोज आती है, 
पर आज एक लम्बी रात ले के आई है, 
      रोज ये साथ चलती थी, 
आज तो परछाई भी साथ लेकर आई है, 
अपनी मंजिल की राह पर चलते चलते, 
न जाने कितने अनमोल पल गंवा बैठे, 
अपना बचपन  भी भुला बैठे पिछे अपनो को छोड़ चले, 
माँ की नाराजगी मे भी चेहरे पर चमकती रहती थी सादगी, 
     भाई बहनों का वो प्यार, 
गले से लगाने पर हर दर्द हो जाता था फरार, 
पापा का मौन रह के भी प्यार, 
जताने का वो अंदाज रास आता था, 
इश्क़ की वो बरसात भी सामने आ गई
उनके और मेरे बीच की नजदीकियां भी 
आखों मे समा गई। 
यादों की बारात फिर से आ गई ।।