इतिहास गवाह है--
समाज की धारा के विपरीत यदि स्त्री चलती है तो उसे अभिशाप मिलता है..! कहानी मेवाड़ की किले की है..।
सुंदर नक्काशी से बने चबूतरे में एकांत में राजा सूरज सेन थे । राजा सूरज सेन ब्रह्म साधना में लीन अपनी ध्यान मुद्रा में थे । रानी चित्रा कहीं बाहर गई हुई थी।
रानी के गांव से एक रिश्तेदार सूर्य बाला नाम की लड़की आई थी , वह अत्यंत खूबसूरत थी ,राजा को देख उनपर मोहित हो गई ।
जब रानी लौटी अपनी रिश्तेदार सूर्य बाला को क्रोध में श्राप दे डाला," जाओ तुम बारह साल तक बूढ़ी हो जाओगी !"
यह देख सूर्यबाला घबरा गी क्षमा म़ागने लगी ," क्षमा..मुझे क्षमा ऐसा मत करो मैं अभी तो बहुत खूबसूरत और जवान हूं ..अभी शादी नहीं हुई है ..ऐसा मत करो रानी मेरे माता पिता मर जाएंगे ...।"
पैरों में पड़ गिड़गिड़ाने लगी ।
रानी के पैरों पर आंसू गिरे व मोती बन जाते.. । जैसे जैसे वह रोती ..!
रानी चित्रा ने सोचा ,"यह सत्य लग रहा है । यह सच कह रही है ..!"
इसलिए ,उसे क्षमा कर दिया कहा "जाओ..बारह बरस बाद फिर इसी यौवन में लौट आओगी जब राजा महेंद्र प्रताप और उसकी पत्नी सोमवती अपने पुत्र के लिए कोई सुंदर सी अप्सरा किले के अंदर ढूंढेंगे तो तुम अपने वास्तविक रूप में आ जाओगी ।" ऐसा कहकर रानी चली गई ।
प्रातः साधक की भांति उठती व तप करती अन्न जल को परित्याग कर साधना में लीन हो गई ..! ऐसे कल्मष के संताप के लिए यह साधना आवश्यक हो गई थी ..!
लाचार बूढ़ी ने बारह बरस तक महल में सेवा- साधना में बिता दिए ..!
आखरी बरस :
हालत दयनीय हो गई ,वह कमर झुकाकर चलती ,केशों में रजत रंग चढ़ने लगा था ..!
अंततः मन विचलित होने लगा "--कहां जाऊं और क्या करूं , प्रभु साधना करने में भी अक्षम्य हूं ? !"
लाचार जब रोगग्रस्त हो गई, खाट पर पड़ी रहती .।
आंखों से अश्रू अनवरत बहते, बोलीे," हे ईश्वर ये कैसी परीक्षा है ? मैंने क्या किया ? मेरी क्या गलती है ? दया करो ,मुझपर दया करो !"
तभी उसके घर के बाहर पद चाप सुनाई दी , उसने जैसे ही द्वार खोले , वैसे ही वह एक सुंदर स्त्री के रूप में वह परिर्तित हो गई..! उसकी साधना सफल हो गई थी ..!
वहाँ राजा और रानी ,खूबसूरत स्त्री को देख पुत्र वधु के ख्याल को दिल में रख , उसके पास पहुंचे ...
वे बोले,--"हे सुंदरी ! तुम्हारा नाम क्या है?"
प्रसन्नता से बोली ," महोदय ..! मेरा नाम सूर्यबाला है..! मैं बारह बरस तक बूढ़ी देह में परिवर्तित हुई स्त्री थी , मेवाड़ के महल में कैद थी , साधना करते हुए मेरा जीवन बीत रहा था ..! आज आपने मेरे तप को राह दे दी ..जिसे मेरा जीवन धन्य हो गया ..!।"
रानी स्नेह से बोली ,"सूर्य बाला तुम हमें पसंद हो और हम तुम्हें अपनी पुत्रवधु स्वीकार करते हैं ,मेरा बेटा रविचितौड़ का अत्यंत प्रतापी कुमार है ,।"
साधना से ही सूर्यबाला को रानी चित्रा के श्राप से मुक्ति मिल गई ,अंत में ..चितौड़ की रानी बनी । (स्वरचित सुनंदा ☺️)

0 टिप्पणियाँ