हे मेरे आराध्य! करूँ नित तेरी ही आराधना।
तू ही सबका दाता है,मुझे दिखता है ज़र्रे ज़र्रे में।
दिन सुनहरे, रात रुपहली,
कैसा अद्भुत सृजन हुआ है।
घड़ी-घड़ी का मूल्य अमूल्य है,
कण-कण तो अनमोल बड़ा है।
जहं तहं देखूँ रूप तिहारा,
बसा हुआ है चतुर्दिक में।
फिर भी ऐसी जीवित हूँ मैं,
प्यासे नैना तरस रहे हैं,
दरस तुम्हारा पाने को।
हरी-भरी धरती प्रसरित है,
ताने वितान अम्बर नीलाभ,
उसमें टंके हुए है स्वर्णिम,
झिलमिल करते असंख्य सितारे।
नील गगन से झांके दिनकर,
जलधि में दिखे ज्यों रजत स्तम्भ।
खे-भू का मिलन क्षितिज कहलाए,
पर कभी भी मिल ना पाए।
कैसी कपोलकल्पित माया है?
ओर छोर कोई हाथ ना आए।
हर दिन स्वर्णिम हैं, निशा मधुलिका हुई चाँदनी।
आस सुनहरी विलसित फसलों की,
नित- नूतन नर्तन करती प्रकृति निराली।
हे सृष्टि का भाग्य-विधाता! नित करूँ मैं तेरी आराधना।।
रचयिता -
सुषमा श्रीवास्तव
मौलिक कृति

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