मिलती हूं तन्हाई में , मैं खुद से
जिसे न पहचानी थी, न जाने कब से 🍂
हर चीज का सीखा , मैंने जो सलीका
रह न जाए ,जीवन का रंग कभी फीका 🍂
जीवन की जिम्मेदारियां ,निभाते चले गई
लेकिन कुछ बातें , तन्हाइयां भी सिखा गई 🍂
शौक लिखने का ,भावनाएं जो पनपते
पन्नों में शब्द तो , अब ऐसे ही ढलते 🍂
तन्हाई ने ही , सब कुछ सिखलाया
जीवन में मेरी,अहमियत को बतलाया 🍂
मिलती हूं तन्हाई में , मैं खुद से
जिसे न पहचानी थी ,न जानें कब से 🍂
मनीषा भुआर्य ठाकुर (कर्नाटक)

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