साधना का शाब्दिक अर्थ है 'अनुशासित अभ्यास से संचालित क्रिया करना' अथवा 'किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किया जाने वाला कार्य'। वस्तुतः यह एक आध्यात्मिक क्रिया है। धार्मिक और आध्यात्मिक अनुशासन जैसे कि पूजा , योग , ध्यान , जप , उपवास और तपस्या के करने को साधना कहते हैं। अनुरुद्ध प्रगति के लिए साधना को प्रतिदिन करना चाहिए। सनातन धर्म, बौद्ध, जैन, सिख आदि धर्मों में लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भिन्न प्रकार की साधनाएँ की जाती हैं।
         सर्जक ने मनुष्य को न तो अभागा बनाया है और न ही अपूर्ण। इसके अंदर तो वे सभी क्षमताएं बीज रूप में विद्यमान होती हैं जिनके माध्यम से इच्छित  समस्त भौतिक एवं आत्मिक सफलताएँ प्राप्त की जा सकतीं हैं  किंतु आवश्यकता है उन्हें समझने,समुचित उपयोग करने तथा सही दिशा देने की।
            दार्शनिक अथवा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मानव जीवन को एक अनमोलता का ही भाव मिला है।उसके अंदर शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक क्षेत्र में ऐसी अद्भुत कल्पनातीत सामर्थ्य/ क्षमताएं भरी हुई हैं कि जिन्हें यदि विकसित किया जा सके साथ ही सदुपयोग किया जाए तो जीवन में लौकिक व अलौकिक सम्पदा का अंबार लग जाएगा। इतना ही नहीं उसे तो मानवोचित के साथ-साथ देवोचित जीवन जीने के साधन भी प्राप्त हैं तदपि उसे पशुतुल्य दीन-हीन इसलिए जीता है क्योंकि उसने जीवन को परिपूर्णता एवं सुडौलता के सांचे  मेें ढालने वाले मौलिक तथ्यों की ओर ध्यान ही नहीं दिया है और न ही वैसा अभ्यास किया है। जीवन को सही ढंग से जीने की कला को जानना,समझना एवं कलात्मक ढंग से जीना ही 'जीवन जीने की कला' कहलाती है।
      मेरे मन-मस्तिष्क में एक बात और है कि यदि हम समुचित ढंग से सही पथानुगामी रहते हुए अपने समस्त उत्तरदायित्वों और कर्त्तव्यों का निर्वहन करते हुए जीवन यापन कर रहे हैं तो इससे बड़ी कोई साधना है ही नहीं। हमने जो जिम्मेदारियाँ ग्रहण कर ली हैं उनसे किन्हीं भी परिस्थिति में विमुख न होना भी एक साधना है। मैं उस रूप को साधना कभी नहीं मानती जिसमें उत्तरदायित्व व कर्त्तव्य से भागकर आसन जमा लिया जाए अथवा गेरुआ वस्त्र धारण कर प्रवचन दिया जाए या भजन किया जाए।मेरे नज़रिए से यह पूर्णतः अनुचित है। मेरी दृष्टि में सांसारिक व सामाजिक दायित्वों को पूर्ण करते हुए अलौकिकता का सामीप्य ग्रहण करना,सत्पथानुगामी रहना ही सबसे बड़ी साधना है।
धन्यवाद!
राम राम जय श्रीराम!
            
                लेखिका-
             सुषमा श्रीवास्तव 
             मौलिक रचना एवं भाव