अंतर्मन को ही बना लो अपना एक जासूस
रोज पूछ लिया करो क्या किया उसने महसूस
मन से अच्छा प्रशंसक ना कोई ना कोई मन से बड़ा आलोचक अपनी कथनी करनी पानी खोनी का बना लो समीक्षक
मन झूठ नहीं बोलता पर उसे टटोलना है आवश्यक
पद से जब भी भटकता है कोई रोकने की करता वह कोशिश भरसक
मन की करो पर मन की सुनो भी जरूर
क्योंकि करने और सुनने में अंतर होता है हुजूर
क्या किया सही और कितने थे गलत
मन से बेहतर ना समझ पाया अब तक
जब तक ना आए अंतर्मन से गवाही
बुरे काम करने की दे वह मना ही मन की आवाज को जो है दबाते गलत रास्ते पर वही पग बढ़ाते क्योंकि मन तो होता है एक पक्का जासूस
वही बताता है जो वह करता है महसूस
प्रीति मनीष दुबे
मण्डला मप्र

0 टिप्पणियाँ