यूँ तो अभी दिसंबर महीने की शुरुआत ही थी लेकिन दिल्ली की सुबह घने कोहरे की चादर में ढँककर और अलसाने लगी थी।
ऐसी ही एक सुबह में जब राजौरी गार्डन पुलिस स्टेशन में नाईट ड्यूटी पर तैनात सिपाही अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे ही खुद को कम्बल के घेरे में समेटकर नींद की आगोश में समाये हुए थे, फ़टे चीथड़ों में खुद को ढँकने की कोशिश करता हुआ एक भिखारी तेज़ी से दौड़ता हुआ उनके सामने पहुँचा और हाँफते हुए बोला "साहब जल्दी चलिये खून हो गया है।"
ऊँघते हुए हवलदार जिसका नाम सुरेश था, उसने उस भिखारी की आवाज़ सुनकर किसी तरह आँख खोली और बोला "हो गया तो होने दे। मरने वाला तो मर गया हम जिंदों को क्यों इस ठंड में मारने चला आया?"
सुरेश की बात सुनकर भिखारी चुप होकर एकटक उसे देखने लगा।
"ऐसे क्या देख रहा है बे? जबरदस्ती ले जायेगा क्या?" सुरेश ने फिर उसे झिड़का।
भिखारी कुछ कहता कि तभी थाना प्रभारी इंस्पेक्टर मयंक की गाड़ी थाना परिसर में प्रवेश कर चुकी थी।
गाड़ी की आवाज़ सुनते ही दूसरा हवलदार बरन जो अब तक सो रहा था वो भी एक झटके में उठकर बैठ गया।
अंदर आने पर जब मयंक की नज़र भिखारी पर पड़ी तो उसने सबसे पहले अपना जैकेट उसकी तरफ़ बढ़ाया औऱ कहा "पहन लो। बहुत ठंड है।"
भिखारी ने जैकेट लेने से मना करते हुए कहा "नहीं नहीं साहब। हमारे पास कपड़े हैं। वो तो भीलू भाई का खून हो गया तो हम हड़बड़ी में खबर करने ऐसे ही भागे चले आये।"
"कौन भीलू? कब और कहाँ हुआ खून?" मयंक ने पूछा।
"गाँव वाले चौक की दूसरी गली के पीछे हम भिखारियों की छोटी सी बस्ती है साहब। भीलू भाई भी दो महीने से वहीं रहते थे। बहुत भले आदमी थे साहब। दिन भर जो भी भीख उनको मिलती थी शाम में हम सबके बच्चों में उसका खाना बाँट देते थे।
पता नहीं किसने उनका खून कर दिया।" कहते-कहते वो भिखारी रो पड़ा।
"तुम्हें कब पता चला कि उसका खून हो गया है?" मयंक ने अगला सवाल किया।
"साहब जी वो सुबह की चाय मेरे ही साथ पीते थे। चाय बनने पर जब मैं उन्हें बुलाने उनकी खोली में गया तो देखा खून से सनी हुई उनकी लाश पड़ी है और उनका चेहरा भी कुचला हुआ है।" भिखारी ने बताया।
ये सुनकर मयंक आश्चर्य में पड़कर सोचने लगा "भला एक भिखारी से किसी की ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती है कि उसका कत्ल इस बेरहमी से कर दिया जाये और शक्ल भी बिगाड़ दी जाये?"
भिखारी से एफआईआर लिखवाकर मयंक ने हवलदार सुरेश को साथ लिया और भिखारी के साथ गाँव वाले चौक की तरफ चल पड़ा जो वहाँ से आधे किलोमीटर की दूरी पर था।
भीलू भिखारी की कोठरी में जाने पर मयंक ने देखा वहाँ की मिट्टी खून से लाल हो गयी थी।
भीलू के सीने और पेट में गोलियों के निशान थे और उसका चेहरा इस तरह कुचल दिया गया था कि उसे पहचान पाना असंभव था।
मयंक ने तुरंत उसकी बॉडी को पोस्टमार्टम के लिए भेजने का आदेश दिया और फोरेंसिक टीम को फोन किया।
एक दूसरी आश्चर्य की बात ये थी कि भीलू वहाँ दो महीने से रह रहा था इसके बावजूद कोठरी में कोई सामान नज़र नहीं आ रहा था।
कुछ सोचते हुए मयंक ने रिपोर्ट लिखवाने आये उस भिखारी से पूछा "इस भीलू का सामान कहाँ है? क्या ये कोठरी हमेशा इसी तरह खाली रहती थी? और जब गोली चली तब तुमने आवाज़ नहीं सुनी?"
"नहीं साहब हम तो गहरी नींद में थे। हमने किसी तरह की कोई आवाज़ नहीं सुनी। और जो सामान आप पूछ रहे हैं तो कोठरी में एक कोने में उनके कपड़े थे, कुछ बर्तन और कुछ किताबें भी थी साहब।
भीलू भैया पढ़े-लिखे थे। उनको पढ़ना अच्छा लगता था। कभी-कभी कुछ लिखते भी रहते थे।" उस भिखारी ने बताया।
"तो फिर ये सारा सामान गायब कैसे हो गया? इसका मतलब साफ है ये कोई मामूली कत्ल नहीं है। देखो अगर इसमें तुम्हारा कोई हाथ है तो साफ़-साफ़ बता दो। अगर बाद में मुझे पता चला कि तुम इसमें शामिल हो तो अंजाम बहुत बुरा होगा।" मयंक ने भिखारी को धमकाया।
भिखारी गिड़गिड़ाते हुए कहने लगा "नहीं नहीं साहब हम अपने बेटे की कसम खाते हैं हमने कुछ नहीं किया।"
सुरेश अब तक बॉडी को पोस्टमार्टम के लिए भेज चुका था। फोरेंसिक टीम भी आकर अपने काम में लग चुकी थी।
मयंक ने सुरेश से आस-पास रहने वाले सभी लोगों को बुलाने के लिए कहा और फिर से एक बार कोठरी पर सरसरी नज़र दौड़ायी।
अचानक ही उसकी नज़र कोठरी की छप्पर में खोंसे हुए एक डिब्बे पर पड़ी।
मयंक ने उस डिब्बे को खींचा तो वो सिगरेट का खाली डिब्बा निकला।
उस पर लिखे नाम को पढ़कर एक बार फिर मयंक हैरत में पड़ गया क्योंकि वो नामी कम्पनी का बहुत ही महंगा सिगरेट था।
"कमाल है कोई भिखारी इतनी महंगी सिगरेट पीने का शौक भी रखता है।" मयंक जैसे स्वयं से ही बोला।
अब तक बाहर बस्ती के अन्य लोग भी आ चुके थे।
मयंक ने सिगरेट का वो डिब्बा जाँच के लिए फोरेंसिक वालों की तरफ बढ़ा दिया और खुद बस्ती वालों से पूछताछ में लग गया।
आश्चर्य की बात थी कि किसी ने भी गोली की या भीलू के चीखने की आवाज़ नहीं सुनी थी और ना ही बस्ती में किसी अंजान आदमी को आते देखा था किसी ने।
उन सबको कुछ भी पता चलने या किसी पर शक होने पर सीधे पुलिस स्टेशन आने की हिदायत देकर मयंक अपनी गाड़ी में बैठ गया।
मयंक को चुपचाप देखकर सुरेश ने कहा "बड़ा विचित्र केस है सर ये। भिखारी का खून और ऊपर से उसकी छोटी सी कोठरी में चोरी। कोई खजाना छुपाया था क्या उसने? कहीं कोई बड़ा अपराधी तो नहीं था जो वेश बदलकर रह रहा था।"
"हम्म कुछ भी हो सकता है। अब देखते है पोस्टमार्टम रिपोर्ट में क्या आता है। तभी हम आगे कुछ कर पायेंगे इस केस में।" मयंक ने कहा।
जल्दी से जल्दी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करवाने की हिदायत देकर मयंक दूसरे केसेज की फ़ाइल देखने लगा।
वहीं हवलदार बरन सुरेश से गाँव वाले चौक में क्या-क्या हुआ उसकी सारी जानकारी बारीकी से लेने लगा।
मयंक को बरण शुरू से ही पसंद नहीं था। इसलिए वो ज्यादातर सुरेश को ही अपने साथ रखता था।
सुरेश बातूनी जरूर था लेकिन अपने काम के प्रति ईमानदार भी।
मयंक का दिमाग इस वक्त पूरी तरह भिखारी के केस में ही उलझा हुआ था।
फ़ाइल बन्द करके वो उसी के बारे में सोच ही रहा था कि तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी।
मयंक ने मोबाइल उठाया तो देखा स्क्रीन पर कमिश्नर साहब का नम्बर फ़्लैश हो रहा था।
फोन उठाते हुए मयंक बोला "जय हिंद सर।"
"जय हिंद-जय हिंद। कहाँ हो भाई मयंक?" कमिश्नर साहब ने पूछा।
"थाने में हूँ सर। कोई काम था क्या?"
"नहीं काम तो कुछ नहीं। अगर ज्यादा व्यस्त नहीं हो तो घर आ जाओ। नाश्ता करते हैं साथ में।"
"आज सुबह-सुबह ही एक जरुरी केस आ गया है सर। उसी में उलझा हुआ हूँ।"
"अरे तो क्या हुआ? आधे घंटे का वक्त निकालो। तुम भूल जाते हो कि मैं सिर्फ पुलिस कमिश्नर नहीं तुम्हारा बड़ा साला भी हूँ।
अब साले की बात जीजा को माननी ही पड़ेगी।
कहते हैं ना सारी खुदाई एक तरफ, जोरू का भाई एक तरफ।"
"ठीक है सर आता हूँ।" कहकर मयंक ने फोन रख दिया।
उसका मन तो नहीं था लेकिन अब मजबूरी थी कि वो कमिश्नर साहब की बात टाल नहीं सकता था।
जब वो उनके घर पहुँचा तो देखा उसकी पत्नी शिल्पी जो गर्भवती होने की वजह से अपनी भाभी सुमन यानी कमिश्नर साहब की पत्नी की देखरेख में उनके साथ ही रह रही थी, कोई किताब पढ़ते हुए मुस्कुरा रही थी।
शिल्पी को इस तरह मुस्कुराते हुए देखकर मयंक भी कुछ देर पहले का अपना सारा तनाव भूल गया और एकटक उसे देखने लगा।
"नज़र मत लगाइये हमारी ननद को।" सामने से आती हुई सुमन ने हँसते हुए मयंक से कहा।
उसकी बात सुनकर मयंक झेंप गया और कमिश्नर साहब के बारे में पूछने लगा।
मयंक को देखकर शिल्पी भी उसके पास चली आयी।
मयंक और शिल्पी की शादी दो साल पहले हुई थी।
कमिश्नर साहब की ही एक पार्टी में दोनों की मुलाकात हुई थी और फिर शिल्पी ने ज़िद पकड़ ली थी कि वो मयंक के सिवा किसी से शादी नहीं करेगी।
इच्छा ना होते हुए भी अपनी एकलौती बहन की बात कमिश्नर साहब टाल नहीं सके और विवाह को स्वीकृति दे दी।
लेकिन अपने ओहदे और दौलत का रोब मयंक पर झाड़ना वो कभी नहीं भूलते थे।
वहीं मयंक उनकी इन बातों को कभी तवज्जों ही नहीं देता था।
बस हर बात पर मुस्कुरा दिया करता था
नाश्ते की टेबल पर कमिश्नर साहब ने मयंक से पूछा "कौन सा केस आ गया जो तुम सुबह-सुबह ही थाने चले गये?"
मयंक ने उन्हें भिखारी की हत्या वाली बात बतायी और अपने सारे संदेह भी।
उसकी बात सुनकर कमिश्नर साहब बोले "अरे तुम भी क्या इन छोटे-मोटे भिखारियों के केस में इतना उलझे पड़े हो। बस्ती में ही आपस में मार-काट की होगी इन्होंने ज्यादा भीख के लिए या जगह पर कब्जे के लिए।
किसी जूनियर को ये केस सौंपों और अब कुछ दिन मेरी बहन का ख्याल रखो।"
उनकी बात सुनकर मयंक ने कुछ नहीं कहा। बस हाँ में सर हिला दिया।
थोड़ी देर इधर-उधर की बात करने के बाद मयंक वहाँ से निकल गया।
शाम में जब रोज की तरह घर पहुँचकर उसने शिल्पी को फोन किया तो वो उसे कुछ उदास सी लगी।
वजह पूछने पर शिल्पी ने बताया "पता नहीं भैया को क्या हुआ है कुछ दिनों से भाभी से अलग दूसरे कमरे में रहते हैं। ठीक से बात भी नहीं करते।
आज सुबह जब भैया तुमसे मेरा ख्याल रखने के लिए कह रहे थे तब से भाभी और उदास हैं।
सही भी है बहन की इतनी फिक्र और पत्नी की...।"
मयंक ने इस बात पर इतना ही कहा "तुम्हारे भैया तो कभी मुझे समझ में ही नहीं आते।"
अगले दिन सुबह मयंक की मेज पर भीलू भिखारी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ चुकी थी।
उस रिपोर्ट के अनुसार उसका खून सुबह के चार से पाँच के बीच किया गया था।
खून करने से पहले उसे बेहोशी का इंजेक्शन दिया गया था ताकि उसके चीखने की आवाज़ किसी को सुनायी ना दे, साथ ही बंदूक में भी साइलेंसर लगा हुआ था जिससे गोली की आवाज़ भी किसी के कानों में ना पड़े।
"बड़ी हैरानी की बात है कोई एक भिखारी का खून इतने योजनाबद्ध तरीके से क्यों करेगा?" मयंक सोच में डूब गया।
फोरेंसिक की रिपोर्ट में कुछ भी खास नहीं मिल पाया था। किसी अंजान शख्स के कोई निशान कोठरी में नहीं मिले थे।
मयंक ने अपनी गाड़ी स्टार्ट की और एक बार फिर गाँव वाले चौक की तरफ रुख किया।
गली में जाते हुए सहसा उसकी नज़र गली के एंट्री गेट पर ही मौजूद एटीएम पर पड़ी।
वहाँ लगे हुए सीसीटीवी को देखकर मयंक का दिमाग ठनका।
उसने तुरंत एक एक्सपर्ट को बुलवाया और कत्ल वाले दिन की सारी फुटेज उस सीसीटीवी से निकालने के लिए कहा।
ये तय था कि गली में आने-जाने वाला कोई भी उस सीसीटीवी की नज़र से बच नहीं सकता था।
सीसीटीवी की फुटेज ने एक बार फिर मयंक का दिमाग चकरा दिया क्योंकि खून के वक्त या उसके आस-पास ना कोई गली के अंदर जाता हुआ नजर आ रहा था और ना आता हुआ। अंदर जाने का कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था।
"मतलब साफ है सर खून इन भिखारियों में से ही किसी ने किया है।" मयंक की बगल में खड़े हवलदार सुरेश ने कहा।
सुरेश की बात सुनकर मयंक बोला "ठीक कह रहे हो तुम। बहुत बड़ी गलती हो गयी। हमें उसी दिन सबकी कोठरियों की तलाशी ले लेनी चाहिए थी। शायद वो पिस्तौल और भीलू का सामान मिल जाता।
ऐसा करो टीम बुलाओ और अभी तलाशी करवाओ। क्या पता कोई सुराग मिल ही जाये।"
तलाशी के दौरान मयंक भी वहीं मौजूद रहा। लेकिन किसी भिखारी की कोठरी से कुछ नहीं मिला।
उन्हें कड़े शब्दों में चेतावनी देकर मयंक थाने वापस आ गया और अपने अगले कदम पर विचार करने लगा।
ठंड की वजह से सब लोग खुद को टोपी मफलर में इस कदर छुपाये रहते थे कि सीसीटीवी फुटेज से भी भीलू भिखारी के चेहरे की स्पष्ट तस्वीर नहीं मिल सकी थी।
कुछ सोचकर मयंक ने मुर्दाघर जाना तय किया। अभी उसने गाड़ी स्टार्ट ही कि थी कि तभी फिर से कमिश्नर साहब का फोन आया।
"क्या भाई मयंक अभी तक उस भिखारी के पीछे ही पड़े हो?"
"जी सर।"
"अच्छा सुनो मैं सोच रहा था कुछ दिन के लिए शिल्पी को कहीं घुमा क्यों नहीं लाते? फिर अंतिम तिमाही शुरू होने और बच्चे के आने के बाद कहाँ जा पायेगी वो घूमने।"
"सर मेरी बात हो गयी है मेरी पत्नी से। वो भी चाहती है मैं पहले अपनी ड्यूटी के प्रति अपना फर्ज निभाऊँ।
आप ही क्यों नहीं भाभी के साथ कहीं घूम आते।" मयंक ने ये बात कुछ इस तरह कही की कमिश्नर साहब ने बिना कुछ कहे फोन रख दिया।
मुर्दाघर पहुँचकर मयंक ने वहाँ के हेड से भीलू भिखारी की बॉडी दिखाने के लिए कहा।
भीलू की बॉडी देखते हुए मयंक की नज़र उसके दाएँ हाथ पर पड़ी। उसके दाएँ हाथ में छः ऊँगलियाँ थी।
साथ ही उसके बाएँ कंधे पर एक टैटू बना हुआ था।
मयंक ने उस टैटू की तस्वीर अपने मोबाइल कैमरा से ले ली।
अब उसने एक जाने-माने अखबार के दफ्तर का रुख किया।
ये दफ़्तर उसके सबसे अच्छे दोस्त सुशील का था।
मयंक सीधा सुशील के केबिन में पहुँचा और उसे भिखारी वाले कत्ल की जानकारी देते हुए उससे मदद माँगी।
मयंक के लिए हमेशा खड़े रहने वाले सुशील ने अपने अखबार में उसकी गुमशुदगी की खबर छापने का प्रस्ताव दिया।
खबर में ये लिखा जाना था कि ये आदमी जो मेरा भाई था इसकी कोई तस्वीर उपलब्ध नहीं है क्योंकि ये मानसिक रूप से विक्षिप्त है और कैमरे से डरता है।
इसकी पहचान यही है कि इसके बाएँ कंधे पर बाज़ का टैटू बना है और इसके दाहिने हाथ में छः ऊँगलियाँ है।
संपर्क के लिए पते की जगह सुशील ने अपने एक विश्वसनीय कर्मचारी के घर का पता डाल दिया।
दो दिन गुजर चुके थे, लेकिन अखबार की खबर से भी कोई मदद नहीं मिल सकी थी।
शाम होने वाली थी। कोई विशेष काम ना होने पर मयंक थाने से घर के लिए निकल ही रहा था कि तभी उसका मोबाइल बजा।
दूसरी तरफ उसके पिताजी थे जो बिहार के वैशाली जिले के लालगंज गाँव में उसकी माँ के साथ रहते थे।
मयंक के कहने पर भी वो गाँव छोड़कर दिल्ली आने के लिए तैयार नहीं होते थे।
मयंक ने जैसे ही फोन उठाया उसके कानों में पिताजी की घबरायी हुई आवाज़ आयी "बबुआ जल्दी घर आ जाओ। कुछ गुंडे बदमाश अचानक घर में घुस आये और हम दोनों पर हमला कर दिया।
तुम्हारी माँ अब तक बेहोश है।"
पिताजी की बात सुनकर मयंक भी घबरा गया।
पूरे गाँव में उसके पिताजी से किसी की दुश्मनी नहीं थी। वहाँ सब एक परिवार की तरह मिल-जुलकर रहते थे। इसलिए मयंक भी उनकी तरफ से निश्चिन्त रहता था।
फिर अचानक हुए इस हादसे ने जैसे उसके दिमाग का फ्यूज ही उड़ा दिया।
"पिताजी आप माँ को अस्पताल ले जाइये। मैं जितनी जल्दी हो सके आने की कोशिश करता हूँ।" मयंक ने कहा।
"हम अस्पताल में ही है बबुआ। हमारी चीख-पुकार सुनकर तुरंत आस-पड़ोस के लोग आ गये थे। तभी तो हमारी जान बची वर्ना...।" कहते हुए पिताजी रो पड़े।
उनके रोने की आवाज़ ने मयंक को भी दुखी कर दिया।
बड़ी मुश्किल से किसी तरह खुद को संभालकर उसने तुरंत आने का कहकर फोन रखा।
अपने जूनियर इंस्पेक्टर विक्रम को बुलाकर मयंक ने उसे भीलू भिखारी की फ़ाइल दी और किसी तरह की सूचना आने पर उसे खबर करने के लिए कहकर अपने गाँव जाने के लिए निकल गया।
लालगंज जाने के लिए मयंक को पहले दिल्ली से पटना या हाजीपुर पहुँचना पड़ता था।
उसने दिल्ली से पटना की फ्लाइट लेना तय किया और अपने एजेंट को फोन किया।
लेकिन अफसोस कि उस दिन की बची हुई दो फ्लाइटों में कोई सीट खाली नहीं थी।
अगले दिन का इंतज़ार करने से बेहतर मयंक ने ट्रेन पकड़ना सही समझा।
मयंक ने घड़ी देखी। अभी पाँच बजे थे और पटना के लिए नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से ठीक छह बजे संपूर्ण क्रांति ट्रेन खुलने वाली थी।
किसी तरह मयंक के एजेंट ने उसके लिए एक टिकट का बंदोबस्त किया।
दिल्ली की ट्रैफिक की मेहरबानी से ट्रेन खुलने के पांच मिनट पहले मयंक स्टेशन पहुँच पाया।
बस वो जल्दी से जल्दी अपने माँ-पिताजी के पास पहुँचना चाहता था।
लेकिन अफ़सोस कोहरे के कारण देरी से चलती हुई ट्रेन अगले दिन सुबह आठ बजे की जगह रात आठ बजे पटना स्टेशन पहुँची।
वहाँ उतरकर मयंक ने सीधे लालगंज तक के लिए टैक्सी ली।
दो घण्टों के बाद वो अपने घर में था।
अपने माँ-पिताजी को देखकर उसने राहत की साँस ली।
उन्हें कोई विशेष चोट नहीं आयी थी।
उनका हाल-चाल पूछने के बाद मयंक ने उनसे हमलावरों के बारे में पूछा।
"बेटा दो लोग थे। नौजवान ही थे। पर मफलर से चेहरा ढँका हुआ था इसलिए कह नहीं सकते की कौन था।" पिताजी बोले।
"पर जो भी था अपने गाँव का नहीं था। अपने गाँव का कोई लड़का ऐसे रंगीन कपड़े नहीं पहनता। भगवान जाने कौन अचानक हमारा दुश्मन पैदा हो गया।" माँ ने कहा।
माँ की बात सुनकर मयंक ने पूछा "रंगीन कपड़ों के अलावा कोई और खास बात नोटिस की आप लोगों ने?"
दिमाग पर जोर देते हुए पिताजी बोले "हाँ बेटा शोर सुनकर जब लोग आये और उन्हें पकड़ना चाहा तो एक लड़के का मफलर थोड़ा नीचे खिसक गया।
तब मैंने देखा उसने कान में कोई अजीब सी बाली पहन रखी थी।"
पिताजी की बात सुनकर मयंक तुरंत नज़दीकी पुलिस स्टेशन के लिए निकल गया।
वहाँ के प्रभारी इंस्पेक्टर रवि को जब मयंक ने अपना परिचय दिया तब उन्होंने उसे बड़े सम्मान से बैठाया और हमले की एफआईआर लिखी।
मयंक के कहने पर उन्होंने तुरंत अपने खबरियों को फोन किया और कान में बाली पहनने वाले गुंडे के बारे में चुपचाप पता लगाने के लिए कहा।
मयंक का इंतज़ार जल्दी ही खत्म हो गया।
अगली ही सुबह रवि ने उसे फोन करके थाने बुलाया।
थाने पहुँचकर मयंक ने देखा दो लड़कों को जिनकी उम्र बीस-इक्कीस साल रही होगी रवि ने हथकडियाँ पहना रखी हैं।
उनमें से एक लड़के के कान में वैसी ही बाली थी जैसी उसके पिताजी ने देखी थी।
उसे देखते ही मयंक ने गुस्से में उसका कॉलर पकड़ा और पूछा "क्यों मारने आये थे मेरे माँ-पिताजी को?"
वो लड़का रोते-गिड़गिड़ाते हुए मयंक के पैरों में गिर गया और बोला "माफ कर दीजिये सर। गलती हो गयी हमसे। हम दोनों तो छोटी-मोटी चोरियां करते हैं।
परसों सुबह एक आदमी हमारे पास आया और एक चिट्ठी देकर चला गया।
चिट्ठी में आपके घर का पता लिखा था और लिखा था कि आपके माँ-पिताजी को बस थोड़ा सा घायल करना है कि वो बस बीस-पच्चीस दिन अस्पताल में रहे।
इस काम के लिए हमें पचास हज़ार रुपये देने की बात भी लिखी थी।"
अब दूसरा लड़का बोला "साहब हमने सोचा किसी की जान थोड़े लेनी है। अगर हमें पचास हज़ार मिल जायेंगे तो उन्हीं पैसों से हम दूसरे शहर में कोई धंधा शुरू कर लेंगे और गलत रास्ता छोड़ देंगे।"
"तो क्या तुम्हें पैसे मिले?" रवि ने पूछा।
"जी साहब मिले। हम बस ये जगह छोड़कर जा ही रहे थे कि आपने पकड़ लिया।" लड़के ने कहा।
"ठीक है। हम तुम्हें सुरक्षित दूसरे शहर भिजवा देंगे। लेकिन पहले हमें वो नोट दिखाओ।" मयंक ने कहा।
उन्होंने अपने बैग से नोटों की गड्डी निकालकर मयंक के आगे रख दी।
नोटों के सीरियल नम्बर रवि को नोट करने के लिए कहकर मयंक ने उनसे पूछा "तुम्हें ये पैसे कैसे मिले? क्या चिट्ठी वाला आदमी ही देने आया था?"
"नहीं साहब चिट्ठी में लिखा था कि जब वो लोग आपके माँ-पिताजी को अस्पताल जाते देख लेंगे तो हमारे घर पर खुद पैसे पहुँच जायेंगे।
अपना काम करके हम घर पहुँचे तो दरवाजे के अंदर एक लिफ़ाफ़ा फेंका हुआ था जिसमें पैसे थे।" लड़कों ने जानकारी दी।
उनकी बात सुनकर रवि ने कहा "हमला करवाने वाला बहुत शातिर है। तभी उसने मोबाइल युग में चिट्ठी का प्रयोग किया।"
"चाहे जितना भी शातिर हो कानून से बच नहीं पायेगा।" मयंक ने कहा।
रवि से सलाह करके मयंक ने उन लड़कों के खिलाफ अपनी शिकायत वापस ले ली और अपनी तरफ से उन्हें पचास हज़ार रुपये देने का आश्वासन भी दिया।
लेकिन उनकी सुरक्षा के लिए असली अपराधी को पकड़ने तक उन्हें पुलिस स्टेशन में ही रहने के लिए कहा।
उन लड़कों ने मयंक को धन्यवाद कहा और भविष्य में कभी गलत काम ना करने की कसम खाते हुए उसकी बात मान ली।
रवि ने वापस अपने खबरियों को काम पर लगाया ताकि वो पता कर सकें इस सीरियल नम्बर के नोट क्या वैशाली जिले के ही किसी बैंक से निकाले गये हैं?
सोच में डूबा हुआ मयंक जब घर पहुँचा तब उसे भीलू भिखारी के केस की याद आयी।
वो इंस्पेक्टर विक्रम को फोन कर ही रहा था कि हवलदार सुरेश का फोन आ गया।
"सर, विक्रम सर ने भीलू भिखारी के कत्ल के इल्जाम में उसी भिखारी को गिरफ्तार किया है जो उस दिन उसके कत्ल की खबर देने आया था।
उसके घर से भीलू की डायरी के कुछ पन्ने मिले थे।
पर वो भिखारी कह रहा है कि उसने खून नहीं किया। ये पन्ने उसके घर में कैसे आये उसे नहीं पता।
वो बार-बार आपसे बात करने की गुहार लगा रहा है सर।"
सुरेश की बात सुनकर मयंक एक बार फिर परेशान हो गया।
उसने थाने में किसी के ना रहने पर उस भिखारी से बात करवाने के लिए सुरेश से कहा।
कुछ सोचकर मयंक ने अपनी डायरी उठायी और भीलू भिखारी के कत्ल वाले दिन से अब तक हुई सारी घटनाओं को लिखने लगा।
लिखते-लिखते अचानक उसे लगा कि उसके माँ-पिताजी पर हुआ हमला भी कहीं ना कहीं इस कत्ल से ही जुड़ा हुआ है।
ये सब जानबूझकर उसे दिल्ली से बाहर भेजने के लिए किया गया ताकि उसके पीछे इस केस की फ़ाइल को बंद किया जा सके।
"लेकिन कौन हो सकता है आखिर इस सबके पीछे? अब एक बात तो तय है कि ये कत्ल और वो भिखारी आम नहीं है। इसके पीछे कोई ना कोई गहरा राज छुपा हुआ है।" मयंक सोच रहा था।
थोड़ी ही देर बाद फिर से सुरेश का फोन आया।
"सर विक्रम सर हमसे कहकर गये हैं कि हम इसे तब तक मारें जब तक ये जुर्म कुबूल ना कर ले। पर पता नहीं क्यों इस पर हमारा डंडा नहीं उठ रहा। आप इससे बात कर लीजिये। अभी यहाँ कोई नहीं है।" कहकर सुरेश ने फोन उस भिखारी की तरफ बढ़ा दिया।
भिखारी ने रोते हुए मयंक से कहा "साहब जी हमको बचा लो साहब जी। हमने कुछ नहीं किया। ये लोग ज़बरदस्ती मुझ गरीब को पकड़ कर ले आये हैं साहब जी।
आप भले आदमी हैं साहब जी। आप पर हमें भरोसा है। हमें बचा लीजिये साहब जी।"
"कुछ नहीं होगा तुम्हें हिम्मत रखो। मैं किसी निर्दोष को सज़ा नहीं होने दूँगा।" मयंक ने भिखारी को आश्वासन दिया।
सुरेश को कुछ समझाकर मयंक ने फोन रख दिया।
थोड़ी देर बाद जब इंस्पेक्टर विक्रम थाने में आया तब उसे पता चला जुर्म कुबूल ना करने पर सुरेश ने उस भिखारी को इतना पीटा की अब वो अस्पताल में भर्ती है।
अस्पताल में भिखारी को देखकर विक्रम ने चैन की साँस ली और किसी को फोन किया।
दूसरी तरफ से आवाज़ आयी "नहीं उसे अस्पताल में ही रहने दो। मारने की जरूरत नहीं है अभी। वर्ना शक बढ़ सकता है हम पर।"
विक्रम ने हामी भरी और फोन रख दिया।
अब मयंक ने कमिश्नर साहब को फोन किया और कहा "सर मेरे माँ-पिताजी की तबियत हमले के बाद से बहुत खराब है। मैं पन्द्रह दिन की छुट्टी लेना चाह रहा था।"
कमिश्नर साहब ने कहा "हाँ-हाँ पन्द्रह क्या बीस दिन उनके साथ रहो। तुम्हारी छुट्टी कंफर्म हो जायेगी।"
उन्हें धन्यवाद कहकर मयंक ने फोन रखा और रवि से मिलने चल पड़ा।
रवि से बात करके उसने अपनी ही कद-काठी के एक लड़के को अपने माता-पिता की देखभाल के लिए अपने घर पर रखा औऱ नोटों के बारे में कोई खबर मिलने पर बताने के लिए कहकर खुद वेश बदलकर दिल्ली के लिए रवाना हो गया।
दिल्ली पहुँचकर मयंक सीधा सुशील के पास पहुँचा और उससे आस-पास के शहरों में भी भीलू भिखारी की गुमशुदगी की खबर छपवाने के लिए कहा और साथ ही उसके दफ़्तर में ही बने हुए एक्स्ट्रा कमरे में कुछ दिन अपने रहने का इंतज़ाम कर लिया।
इस बार मयंक की योजना काम कर गयी।
खबर छपने के एक दिन बाद ही लगभग बीस वर्ष की एक लड़की जिसका नाम रीमा था, दिये हुए पते पर पहुँची।
रीमा के आते ही सुशील के कर्मचारी ने तुरंत सुशील को खबर दी।
सुशील और मयंक जब रीमा के पास पहुँचे तो उसने कहा "छपी हुई खबर की डिटेल्स मेरे बड़े भाई 'तक्ष' से मिलती है। वो भी कुछ दिनों से गायब हैं। लेकिन वो विक्षिप्त नहीं हैं और ना ही कैमरे से डरते हैं।
फिर मेरी ये भी समझ नहीं आ रहा कि अगर वो खबर मेरे भाई के बारे में ही है तो किसी और ने ये खबर क्यों छपवायी और ये पता क्यों दिया?
मैं इन्हीं सवालों का जवाब जानने आयी हूँ।"
उसकी बात सुनकर मयंक ने उसे भीलू भिखारी और उसके कत्ल की सारी बात बतायी।
कत्ल की बात सुनते ही रीमा बेतहाशा रो पड़ी।
कुछ देर बाद जब वो संभली तब उसने कहा "जिस पेशे में वो थे उसमें एक दिन यही होना था। कितना समझाया था मैंने उन्हें की छोड़ दें ये सब। उनके सिवा मेरा कौन है लेकिन वो कब किसी की सुनते थे।"
"वो ऐसा क्या काम करते थे?" मयंक ने पूछा।
"वो एक जासूस थे प्राइवेट जासूस। बड़े-बड़े अपराधियों को पकड़वाना उनका फितूर था। उनके इसी फितूर ने उनकी जान ली है।" रीमा रोते हुए बोली।
मयंक के कहने पर रीमा ने अपने मोबाइल से उसे तक्ष की तस्वीर दिखायी।
सुशील से बात करके मयंक ने रीमा को इस केस से जुड़े खतरे बताते हुए उसे कुछ दिनों तक यहीं रहने के लिए कहा।
जब आधी रात हो गयी तब चोरी-छुपे मयंक एक बार फिर गाँव वाले चौक में भीलू भिखारी की कोठरी में पहुँचा।
इस बार उसने इस कोठरी को एक जासूस की कोठरी की नज़र से देखना शुरू किया।
बहुत ध्यान से हर जगह देखने पर उसे एक जगह फर्श की मिट्टी कुछ दूसरे ढ़ंग की नज़र आयी।
मयंक ने वहाँ खोदना शुरू किया।
थोड़ी देर खोदने के बाद उसे ज़मीन के अंदर एक बक्सा मिला।
मयंक ने सावधानी से उस बक्से को निकाला और वापस छुपते-छुपाते वहाँ से निकलकर सीधे सुशील के दफ्तर पहुँचा।
वहाँ अपने रूम में उसने बक्से को देखा तो पाया उस पर कोड लॉक था।
मयंक ने तुरंत सुरेश को फोन किया और किसी एक्सपर्ट को लेकर आने के लिए कहा।
एक्सपर्ट ने थोड़ी कोशिश करके उस बॉक्स को खोल दिया।
बॉक्स में तस्वीरों से भरा हुआ एक कैमरा औऱ पेपर्स रखे हुए थे।
उन्हें देखकर मयंक के होश उड़ गये।
उस बॉक्स ने सभी रहस्यों पर से पर्दा उठा दिया था, और उसमें वो तमाम सबूत थे जिसके आधार पर अपराधी को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जा सकता था।
लेकिन उन्हें पकड़ने से पहले उसे एक और महत्वपूर्ण काम को अंजाम देना था।
मयंक ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर चेक की और सुरेश को साथ लेकर सीधा कश्मीरी गेट के लिए रवाना हो गया।
कश्मीरी गेट बस अड्डे के पास ही एक बड़ा गोदाम था।
जब मयंक और सुरेश वहाँ पहुँचे तो देखा उस गोदाम के दरवाजे पर छः बंदूक-धारी पहरा दे रहे थे।
वो दोनों किसी तरह गोदाम के पीछे पहुँचे जहाँ एक पुराना पेड़ खड़ा था।
"किसी ने सच ही कहा है प्रकृति हमेशा हमारी मददगार ही साबित होती है।" सोचता हुआ मयंक पेड़ की डालियों पर चढ़ा।
संयोग से पीछे एक खिड़की उसे दिख गयी।
खिड़की के रास्ते मयंक और सुरेश गोदाम के अंदर प्रवेश कर गये।
पूरा गोदाम अँधेरे में डूबा हुआ था।
उन्होंने अपने साथ लायी हुई टॉर्च जलायी और बॉक्स में मिली हुई तस्वीर के अनुसार एक खास कमरे को ढूँढने लगे।
कुछ ही देर में उन्हें वो कमरा मिल गया।
लेकिन इससे पहले की वो अंदर जाते कुछ लोगों ने उन पर हमला कर दिया।
लेकिन मयंक और सुरेश ने मिलकर उन्हें चित्त कर दिया।
उठापटक की आवाज़ सुनकर अंदर कमरे से किसी के धीमे-धीमे कराहने की आवाज़ आने लगी।
मयंक और सुरेश अब बिना देर किये अंदर गये और वहाँ कैद शख्स के हाथ-पैर खोलकर उसे आज़ाद किया।
उस शख्स ने मयंक को देखते ही उसे गले से लगा लिया।
कैद में रहने की वजह से उसकी हालत खराब थी। फिर भी मयंक और सुरेश ने किसी तरह उसे खिड़की के रास्ते बाहर निकाल ही लिया।
सुबह का सूरज निकलने से पहले मयंक और सुरेश उस शख्स को प्राथमिक चिकित्सा के लिए सुरक्षित अस्पताल पहुँचा चुके थे।
अस्पताल के रास्ते में ही उस शख्स ने मयंक को समझा दिया था कि आगे क्या और कैसे करना है और खुद कुछ लोगों को फोन करके एक विशेष पुलिस टीम को मयंक के साथ जाने के लिए भी कह दिया था।
इस मिशन पर जाने से पहले फ्रेश होने के लिए मयंक सुशील के दफ्तर चला गया।
फ्रेश होकर वो निकल ही रहा था कि शिल्पी का फोन आ गया।
उसने माँ-पिताजी के बारे में पूछा और कहा "भैया भी उनसे बात करना चाहते हैं।"
"जरूर बात करवाऊँगा उनसे। पर अभी वो आराम कर रहे हैं। बस आधा घण्टा रुक जाओ।" मयंक ने कहकर फोन रख दिया।
उधर इंस्पेक्टर रवि को भी उन नोटों की जानकारी मिल गयी थी और उस जानकारी की मदद से वो शख्स गिरफ्तार किया जा चुका था जिसने उन दोनों लड़कों को मयंक के माँ-पिताजी पर हमला करने के लिए पैसे दिए थे।
उस शख्स ने बताया कि उसे दिल्ली से उसके दोस्त ने फोन करके ऐसा करने के लिए कहा था।
मयंक को मिली हुई विशेष पुलिस टीम में से कुछ लोगों ने जाकर उसके उस दोस्त को गिरफ्तार कर लिया।
उसके साथ-साथ इंस्पेक्टर विक्रम और हवलदार बरण के हाथों में भी हथकड़ियां लग चुकी थी।
उन सबके गिरफ्तार होने के बाद मयंक कमिश्नर साहब के घर पहुँचा।
मयंक को देखकर शिल्पी चौंक उठी।
"अरे तुम तो गाँव पर थे ना?" शिल्पी ने पूछा।
"क्या करूँ तुम्हारी याद यहाँ खींच लायी।" मयंक बोला।
"अरे आइये-आइये ननदोई जी।" सुमन भी आती हुई बोली।
उसे प्रणाम करते हुए मयंक ने पूछा "कमिश्नर साहब कहाँ हैं भाभी?"
"वो अपनी सुबह की पूजा कर रहे हैं। आइये आप भी आरती में शामिल हो जाइये।" सुमन बोली।
"हाँ-हाँ जरूर।" कहकर मयंक ने जूते उतारे और पूजा कक्ष की तरफ़ चल पड़ा।
कमिश्नर साहब पूरी श्रद्धा से आरती गा रहे थे।
आरती खत्म होने के बाद जब कमिश्नर साहब पीछे मुड़े तब मयंक को देखकर वो भी चौंके पर कुछ बोले नहीं।
आरती लेती हुई शिल्पी बोली "बधाई हो भैया। आपका उच्चारण तो सुधर गया। पहले आप लक्ष्मी माँ की आरती में हर-विष्णु-धाता को हर-विष्णुर्र धाता गाया करते थे और हम सब कितना मज़ाक उड़ाते थे आपका।"
"वो तो तुम्हें अब भी उड़ाना होगा क्योंकि मेरा उच्चारण आज भी वैसा ही है।" सहसा एक आवाज़ कमरे में गूँजी।
उस आवाज़ की दिशा में जब सबने देखा तो उन्हें जोर का झटका लगा सिवा मयंक के, क्योंकि सामने खड़े शख्स की शक्ल हूबहू कमिश्नर साहब से मिल रही थी।
सुमन और शिल्पी चक्कर खाकर गिरने ही वाली थी कि मयंक और अभी-अभी आये कमिश्नर साहब ने उन्हें संभाल लिया।
मयंक के इशारे पर बाहर खड़ी पुलिस की टीम ने आरती गा रहे नकली कमिश्नर को गिरफ्तार कर लिया और उसे लेकर जाने लगे कि तभी सुमन बोली "रुकिये। ये सब क्या हो रहा है कोई मुझे बतायेगा?"
हथकड़ी पहने हुए शख्स को एक जोरदार थप्पड़ लगाते हुए कमिश्नर साहब बोले "अपने गुनाहों कि कहानी तू खुद बोलेगा या मैं बताऊँ?"
"मुझे कुछ नहीं कहना और याद रखना तू अपने बड़े भाई को गिरफ्तार कर तो रहा है पर मैं ज्यादा दिन कैद में नहीं रहूँगा। मेरी बहन अपने पति से कहकर जरूर मुझे बचायेगी। है ना बहना?" कहते हुए उस शख्स ने शिल्पी की तरफ देखा।
शिल्पी ने नफरत भरी नजरों से उसे देखते हुए कहा "कभी नहीं। जिस दिन तुम्हारे काले कारनामे सामने आये थे मैंने उसी दिन कह दिया था कि मेरा सिर्फ एक ही भाई है।"
सुमन उसकी तरफ देखकर बोली "कम से कम इस बात के लिए तुम्हारा धन्यवाद की तुमने मेरे बेडरूम में पैर नहीं रखा।"
उसे ले जाने के लिए कहकर कमिश्नर साहब सुमन से बोले "तुम्हें क्या लगता है ये मेरा जुड़वा भाई शराफ़त के कारण तुमसे दूर रहा? ये इसलिए दूर रहा क्योंकि जानता था कि एक पत्नी नज़दीकियों में कभी अपने पति को पहचानने में भूल नहीं करेगी।"
मयंक ने अब सारी कहानी बताते हुए कहा "दरअसल कमिश्नर साहब का ये भाई जिसने स्वयं को मृत घोषित कर रखा था एक बहुत बड़ा ड्रग माफिया है।
दिल्ली में भी धीरे-धीरे इसका जाल फैलता जा रहा था। जिसमें कई बड़े-बड़े लोग उसका साथ दे रहे थे।
जब कमिश्नर साहब को इस बात की खबर लगी तब वो जानते थे कि बिना ठोस सबूतों और गवाहों के वो इन लोगों के गिरेबान पर हाथ नहीं डाल सकते हैं।
इसलिए उन्होंने गाजियाबाद में रहने वाले जासूस तक्ष से संपर्क किया।
तक्ष भिखारी का वेश बदलकर भिखारियों की बस्ती में रहने लगा।
उसने बहुत सारे सबूत जुटा लिए थे लेकिन इन लोगों को उसके बारे में पता चल गया।
तब इसने पहले कमिश्नर साहब को किडनैप किया और चालाकी से उसकी जगह खुद आ गये।
चूँकि दोनों भाई आइडियल जुड़वा हैं रंग-रूप आवाज़ सब एक तो किसी को शक होने का सवाल ही नहीं था।
उस पर उसे कमिश्नर साहब की हैंडराइटिंग की नकल उतारनी भी आती थी।
फिर बचा तक्ष तो उसी बस्ती की एक महिला भिखारी को लालच देकर उसे अच्छी तरह ट्रेंड करके उससे उन्होंने तक्ष का खून करवा दिया और उसका चेहरा भी बिगाड़ दिया ताकि उसकी शिनाख्त ना हो सके।
साथ ही उस औरत के माध्यम से तक्ष की कोठरी में मौजूद सारा सामान भी गायब करवा दिया।
इन लोगों ने सोचा था कि एक मामूली से भिखारी के खून को पुलिस गंभीरता से नहीं लेगी और पुलिस के बीच मौजूद अपने आदमी से ये किसी गरीब बेबस को जबर्दस्ती कत्ल के इल्जाम में पकड़कर केस बन्द करवा देंगे और उस औरत को भी कहीं दूर भेज देंगे।
लेकिन अफसोस की मुझे शुरू से ही ये केस मामूली नहीं लगा और मैं इसमें घुसता चला गया।
इसलिए बार-बार नकली कमिश्नर साहब मुझे काम छोड़कर कभी पत्नी के साथ घूमने की सलाह देते थे तो कभी दूसरे केस को लेने की सलाह देते थे।
फिर भी जब मैंने उनकी बात नहीं मानी तब उन्होंने मेरे माँ-पिताजी पर हमला करवाया और मेरे यहाँ से जाते ही पहले उस औरत को गायब किया, फिर उससे मिले हुए तक्ष के सामान में से उसकी डायरी के कुछ पन्नों को फाड़कर दूसरे बेगुनाह भिखारी की कोठरी में रख दिया और मार-पीटकर उससे जबरदस्ती कत्ल का इल्जाम स्वीकार करने के लिए मजबूर करने लगे।
लेकिन फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी। तक्ष ने भी मरते-मरते अपना फर्ज निभाया और सारे सबूत सुरक्षित ऐसी जगह छोड़कर गया जहाँ खोजने की कोशिश उस महिला ने की ही नहीं।
तक्ष का जो थोड़ा बहुत सामान और डायरी इन लोगों को उस महिला से मिली उसे देखकर ये लोग निश्चिन्त हो गये थे कि पक्के सबूत जुटाने से पहले ही उन्होंने तक्ष को अपने रास्ते से हटा दिया।"
कमिश्नर साहब मयंक के कंधे पर हाथ रखते हुए बोले "जुर्म का अँधेरा कितना भी घना हो, एक दिन उसे छँटना ही पड़ता है।
तुम्हारा लाख-लाख धन्यवाद की तुमने अपनी सूझ-बूझ और लगन से ना सिर्फ मेरी जान बचायी बल्कि इतने बड़े-बड़े अपराधियों को भी पकड़वाया।"
सुमन और शिल्पी ये सब सुनकर मानों सदमे में ही चली गयी थी।
मयंक ने हवलदार सुरेश और अपने दोस्त सुशील के साथ-साथ लालगंज के थाना प्रभारी इंस्पेक्टर रवि के बारे में बताते हुए कमिश्नर साहब से कहा "सर इस केस की सफ़लता का श्रेय अकेले मुझे नहीं इन सबको जाता है।"
थोड़ी देर में मयंक के साथ कमिश्नर साहब खुद अस्पताल पहुँचे और वहाँ भर्ती भिखारी से मिलकर उसे सांत्वना दी और कहा कि अब उसे घबराने की जरूरत नहीं है।
उस भिखारी के आग्रह पर कमिश्नर साहब ने जल्दी ही उसे कोई काम देकर उस बस्ती से निकालने की बात भी स्वीकार कर ली।
हवलदार सुरेश और सुशील से मिलने के बाद कमिश्नर साहब रीमा से मिलने पहुँचे और उसे अपने घर चलने का आग्रह करते हुए बोले "तुम्हारा एक भाई नहीं है तो क्या दूसरा भाई अभी ज़िंदा है।"
सुमन ने भी खुले मन से रीमा का परिवार में स्वागत किया।
छब्बीस जनवरी के दिन जब माननीय राष्ट्रपति द्वारा मयंक को इस केस को सुलझाने और ड्रग के जाल में देश के युवाओं को फँसने से रोकने के लिए सम्मानित किया, तब आज तक उसे कमतर आँककर उससे चिढ़ने वाले कमिश्नर साहब सबसे ज्यादा गर्मजोशी से तालियां बजाते हुए नज़र आ रहे थे।
©शिखा श्रीवास्तव

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