मानव मन विकारों की खान होता है। दूरी से भी मन की दुर्भावना दूर नहीं होती। फिर नजदीकी में तो मन में बसे विकार अपना प्रभुत्व दिखाते जाते हैं। मनुष्य चाहकर भी उनसे बच नहीं पाता।

   जब सौदामिनी को सहारे की आवश्यकता थी, उस समय सोहन ने उसे सहारा नहीं दिया। अनजाने पुष्प की सुंदरता में मोहित भंवरे ने अपने जीवन को ही दाव पर लगा लिया। अब जबकि सौदामिनी अनेकों वर्षों से पूरे परिवार का सहारा बनी हुई थी, सोहन का मन उसे पाने के लिये ललचाने लगा। मन में उसकी रूप कांति उतरती ही न थी। कई वर्षों तक सन्यास का पालन करने बाला वह यह भी भूल चुका था कि कभी उसी ने ही सौदामिनी को अपनी माॅ के समान कहा था।

   वाणी की लाज रख पाने में भी मन असमर्थ था। रही बची कसर अड़ोसी, पड़ोसी पूरी कर रहे थे। जिन बातों को बराबर सुना जाता है, वही बात सत्य लगती हैं। स्त्री के मन को तो वैसे भी ज्यादातर लोग महत्व नहीं देते हैं।

   सोहन के दोस्त उसके हितैषी बन उसे फिर से जीवन आरंभ करने की शिक्षा दे रहे थे। उसे सौदामिनी से विवाह कर लेने की सलाह दे रहे थे।

  केवल युवाओं की आपसी बात न थी। मौका मिलते ही अनेकों बुजूर्ग उसे अपनी राय देने से न चूकते। बिना मांगे सहायता करने में कोई भी कम नहीं पड़ रहा था।

   संभव है कि लड़के के भले के लिये माता पिता ही नहीं सोच रहे हों। ऐसे में ठाकुर सुजान सिंह से वार्तालाप करने को अनेकों बुजुर्ग तैयार थे। अनेकों ने तो ठाकुर साहब को भी अपनी राय दे दी। हालांकि ठाकुर साहब को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। उनकी नजर में सौदामिनी भी उनकी बहू नहीं बल्कि बेटी ही थी। फिर केवल बेटे का हित ही महत्वपूर्ण नहीं है। बेटी के मन की मानसिक उच्चता से वह पूरी तरह परिचित थे।

   बाहर के लोग तभी आगे बढते हैं जबकि घर से ही कोई उन्हें आगे बढाने को प्रोत्साहित करे। यदि सोहन ही उन्हें कह देता कि भाभी तो माॅ समान है। पहले भी भाभी को माॅ समझा था, आज भी उसे माॅ ही समझता हूं। तो भला दूसरों की हिम्मत कैसे बढती।

   शुभचिंतकों ने सौदामिनी से भी कह दिया। उसके खुद के जीवन संवारने के साथ साथ लक्ष्मी को भी पिता की कमी पूरी होने की भावना को सौदामिनी समझ न सकी। क्या अब वह बेसहारा है। यदि वह चाहती तो कभी का दुबारा विवाह कर सकती थी। इतने समय में जबकि परिवार में कोई भी पुरुष माता पिता के सहयोग के लिये न था, वही तो अपने सास ससुर का ध्यान रखती रही है। लक्ष्मी को उसी ने माता का प्रेम दिया है और उसी ने पिता का भी। 

  बेटे के मन में क्या चल रहा है। यह एक माॅ बहुत अच्छी तरह जान लेती है। पूर्व में सोहन द्वारा सौदामिनी को माता कहना उसका ढोंग था। फिर भी खुद को सोहन की माता समझ वह उसके मन में सरस्वती के लिये उपजते प्रेम को पहचान गयी थी। माता एक भाव होता है। सौदामिनी भले ही आयु में सोहन से कुछ छोटी ही थी। पर मात्र भाव के कारण अब वह सोहन से बड़ी ही थी। 

  मात्र स्वरूपा सौदामिनी अपने पुत्र सोहन के मन में उठ रहे विकार को समझ रही थी। निश्चित ही सहारे की आवश्यकता एक स्त्री को नहीं होती है। सहारे की आवश्यकता एक पुरुष को होती है। पुरुष मन अक्सर बार बार गिरता है। आदर्शों का ढोंग रचाकर भी उनका पालन नहीं करता है। फिर एक स्त्री को सहारा देने की आवश्यकता होती है। 

   एक माता अपने पुत्र को गिरने नहीं दे सकती है। माता हमेशा अपने पुत्र के उत्थान की ही चिंता करती है। यदि एक माता अपने पुत्र का हित न चाहे तो वह निश्चित ही माता नहीं है। 

  एक बेटे का सहारा निश्चित ही माता होती है। पत्नी भी पति को सहारा देती है। सहारा तो पुत्री या पुत्रवधू भी देती है। बस हर संबंध की एक अलग मर्यादा होती है। मर्यादा नष्ट होते ही संबंध नष्ट हो जाता है। फिर अच्छा भी बुरा हो जाता है। 

  माता का यही कर्तव्य है कि वह पुत्र का हर तरीके से हित करे। भौतिक हित की अवधारणा को पार कर हित के उच्चतम शिखर का स्पर्श करे। संसार के लोगों की बातें तो बदलती रहती हैं। अक्सर वे इतना बड़ा सोच नहीं सकते। इसमें किसी का कुछ दोष भी नहीं है। सभी अपने अपने सामर्थ्य से विचार करते हैं। अपनी अपनी सामर्थ्य से अच्छा या बुरा की समीक्षा करते हैं। अनेकों बार अच्छा वह नहीं होता है जिसे बहुमत अच्छा बताये। बड़े मानस के एक ही व्यक्ति की राय अनेकों की राय से अधिक महत्वपूर्ण होती है।

  सौदामिनी निश्चित ही सोहन को सहारा देगी। पर वह सहारा एक पत्नी का नहीं होगा। माता की अंगुली पकड़ बालक अपनी राह पर चलेगा। गिरकर फिर से उठेगा। सोहन को किस तरह सहारा देना है, सौदामिनी के मानस में इसके लिये पूरी योजना तैयार हो चुकी थी।

  क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'