रोज अंधेरों से गुफ्तगू करती है बेटियां
सड़क पर सरेआम निकलने से डरती है बेटियां
कभी निर्भया कभी मनीषा होती है बेटियां ,
किसी खास जांत पांत की नहीं होती है बेटियां।
जिस्म के सौदागरों की क्या नहीं होती है बेटियां,
नहीं कांपती है रूह जब काटी जाती है बोटियां ।
किसी कानून के अधिकार में नहीं आती हैं बेटियां,
ना पेट में, ना बाहर, बच पाती है बेटियां ।
खुद ही बनो मुवक्किल ,गवाह और जज भी ,
तभी मिलेगा तुम्हें हक ,अरे सुनो ना बेटियां।
क्यों भुगते वह कैद ,हवस के सौदागरों की खातिर ,
बचाओ बेटियां ,मत मारो बेटियों मत मारो बेटियां।
स्वरचित सीमा कौशल यमुनानगरमुना नगर हरियाणा

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