दिए तेरे ग़म से में अब तो उबर रहा हूं,

देख मेरी जिंदगी में खुद सवर रहा हूं।

चिलचिलाती धूप में भी अब मैं निखर रहा,

क्योंकि तेरे गमों से अब मैं सुधर रहा हूं।।




चाहा था तुमने बहुत बेरहमी सी जिंदगी मेरी,

इसलिए तो गमों का तुमने मुझे अम्बार दिया।

मैं था नादान इसलिए लिए तेरी खुशियों के लिए,

नफरतों की दुनिया में बेपनाह प्यार किया।।




शायद मैं समझ न सका जीवन की कड़ियों से,

तभी तो दिल लगा बैठा गम की हथकड़ियों से।

बीत गया वह समय आंसुओं की धारा से,

जहां मैंने भी तुमसे बेहपनाह  था प्यार किया।।





जिन्दगी की उलझनों को मैं भी समझ चुका हूं,

प्रेम तो बस भ्रम है वह आकर्षण का केंद्र रहा।

तु खेलती रही मेरी जीवन की अविरल नदियों से,

मैं समझ गया वह तेरा अविकल सा स्नेह था।।




जिन्दगी को तुमने तो कर दिया था खत्म ही,

क्योंकि तुझसे मेरे जीवन से जो सच्चा स्नेह था।

भूल गया हूं मैं तुम्हें आजादी से जीवन जी रहा हूं,

तेरी गमों की विष को भी मैं सुधा रस सा पी रहा हूं।।




चाहता हूं खुशियों का अम्बार रहे तेरी दुनिया में,

क्योंकि शायद कभी मुझे भी तुमसे स्नेह था।

अब तुम से जीवन का ना अब वह नेह रहा,

अब तुम से  जीवन का ना अब वह नेह रहा।।



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                 "मित्र"