दीप ऐसा जो सबके लिए जलता समान है!
पर प्रकाश को छोड़ ,उसके लिए मरता एक कीट है!
दीप के छाये तले निकलते कई शूरवीर है!
पर सच मे जो प्रेमवश जलता एक छीट है !
अब अनजान है या जानकर लक्ष्य उसका एक है!
पर उजाले के लिए दिखते वहाँ अनेक है।
दीप हो ना ! क्या पता अंतर तुमे अज्ञान का ।
हर बार तुममे ही जले क्या है तरीका ज्ञान का ?
पंतगा तुम्हारी चाह मे जलता है और मरता है !
ज्ञानी बन कर फिर भी कहते यह क्या तू करता है !!
~सौरभ़

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