हाँ, उसे बहुत कुछ कहने का मन करता है, 
                          पर सामने से कह नहीं पाती।
कह दूँ उसे या चुप रह जाऊँ,
                      मैं खुद यह समझ नहीं पाती।।


तुम चले जाते हो जब घर से बाहर,
                          खुद को मैं रोक नहीं पाती।
तेरे साथ बाहर जाने का मन करता है,
                   जब अकेले घर में रह नहीं पाती।।


बड़े से घूँघट में गुजरती हूँ आईने के सामने से,
                             वह घुटन मैं सह नहीं पाती।
वो रिवाज मुझे कतई पसंद नहीं था लेकिन,
                         उसको खुद बदल नहीं पाती।।


सुनती हूँ उलाहने कि माँ ने कुछ सिखाया नहीं,
                         मैं बर्दाश्त उन्हें कर नहीं पाती।
बहु ही देखी थी ना नौकरानी तो नहीं,
                           पलटकर ये कह नहीं पाती।।


तुम्हारी गलतियां नादानी सी लगती है,
                          उस पे बहस हो नहीं पाती ।
मेरी तो गलतियां भी जानबुझ के होती है,
                          छुपाए भी छुप नहीं पाती।।


जब तुम देते हो साथ मेरा ससुराल में,
                 खुद को अलग समझ नहीं पाती।
सबके तानों को हँसकर भुला देती हूँ मैं,
                शिकायत तुमसे कर नहीं पाती।।


तुम्हारे साथ होने से एक विश्वास दिल में रहता है,
                     पराया खुद को समझ नहीं पाती।
गीला तौलिया भी मुस्कुरा के उठा लेती हूँ,
                   मैं आदत तेरी बदल नहीं पाती।।


सब कुछ भुल दिया है तुम्हारी खातिर,
                    पर इक सपना मैं भुला नहीं पाती।
दुनियां में मेरा भी कहीं नाम होता,
                      यह ख़्वाब में मिटा नहीं पाती।।

कैसे सच करुंगी मैं वो सपना,
                 खुद से कभी पूछ नहीं पाती।
सब कुछ छूट गया मुझसे,
                 पर तुझसे कुछ कह नहीं पाती।।


                       रंजना सोनी