लम्हा लम्हा गुजरा 
आस लगाए बैठे है...

दामन में होंगी खुशियाँ.. 
उम्मीद लगाए बैठे है... 

चाँद तो चाहा नहीं 
जो नामुमकिन हो मिलना.. 

हम तो छत पर 
आपके दीदार को बैठे है... 

धुप भी उतर आयी अब तो 
सुखाने होंगे तुम्हे कपडे 
यही बहाना सोच बैठे है.. 

देख लेते है युहीं बार बार 
घर को तुम्हारे... 
ना जाने किस पल निकल आओ बाहर. 
आँखे गड़ाए बैठे है..... 

सूझता ही नहीं कुछ 
तुम्हे देखे बिना.... 
हम तो वरना काम करने को ही बैठे है.... 

देखो इस कदर भी ना 
मुस्कुराओ, 
देख कर हालत ये हमारी... 
तुम से ही तो दिल लगाए बैठे है

बेकार नहीं ये बंदा 
बड़े  काम का है... 
क्या करें इश्क़ में बदनाम हुए बैठे है...  

अब तो थोड़ी कर दो 
रहमों करम हम पर... 
होने को कई काम हमारे नाम बैठे है..



                     कृष्णा सिंहा  
          चित्तौडग़ढ़, राजस्थान