अवसर था करवाचौथ का,
सुहागिनों के श्रद्धा,प्रेम का।
व्रत की तैयारी जोरों से हो रही थी।
बाजारों मेंं रौनक खूब लग रही थी।
पार्लर मेंं लाइन लम्बी खूब  लगी  थी।
सूंदर दिखने की सब में होड़ लगी थी।
कुछ सुहागनें मेहंदी लगवा रही थीं।
आपस में हंस कर बतिया रही थीं।

एक सखी ने कहा-
मेहंदी मेरी  बहुत सुर्ख  रचती है।
पति  से तारीफ़ मिलती रहती है।
वो  मुझे बेइंतहा प्यार करते हैं।
इशारों पर  मेरे  नाचते रहते हैं।

दूसरी सखी -
तुम्हारे आंख में प्याज़ बहुत लगती है।
सासुजी तेरी तुम्हें बहुत प्यार करती है।

यही कहा था न तुमने किसी बात पर !
कल देखा उन्हें डांटते हुए जी भर कर।

ऐसे ही तेरे पति भी प्यार करते होंगे।
उल्टे तुझे ही  इशारों पे,नचाते   होंगे।

तीसरी सखी-
भई! मुझेें तो केमिकल वाली मेहंदी,
लगवाकर दिल को सुकूँ मिलता है।
मेरा पति अपना प्यार दिखाता नही, 
पर प्यार तो बहुत करता है।

चौथी सखी-
सखियों ! मेरी मेहंदी एकदम हल्की रचती है।
पर मुझे  बेड टी हमेशा टाइम पर मिलती है।

इसी तरह कुछ और देर तक उनका ,
हास्य  व्यंगात्मक वार्तालाप हुआ।
मेहंदी लगाने वाले का दिल मुफ़्त में बाग़ बाग़ हुआ।

नोट: केमिकल वाली मेहंदी बहुत सुर्ख रचती है।

स्नेहलता पाण्डेय
नईदिल्ली