"पानी"कहती" नारी " से,
तू " नारी " मैं " पानी " हूँ!
दोनों देती " जीवन " हैं!
हम दोनों जीवन के आधार!
अहं में पड़कर ना करें,
कोई हमारा तिरस्कार!
तुझ ( नारी) बिन " घर " सूना,
मुझ ( पानी) बिन " जग सूना,
दोनों का है, मह्त्व अपार!
श्वेत हृदय सी, चंचल तन सी,
है हम दोनों की काया,
अपने- अपने पथ पर चलना,
है, हम दोनों का व्यवहार!
प्रेम ही जाने, प्रेम ही बाटें,
बिना " प्रेम " जीवन बेकार!
सतत् " गति " में रहना ही है,
हम दोनों का जीवन,
जिस " साँचे " में ढाल हमें दे,
ले लें, हम वही आकार!
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श्वेता कर्ण!

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