जब गगन घिरा था आंधी से,
तब बिजली बन तुम चमके थे ।
जब शत्रु शोले दहक रहे थे,
तुम बादल से गरजे थे ।

बरसात करी थी प्रलयमयी,
ओलों का उल्कापात किया,
तब हे भारत के वीर पुरुष, 
तुमने ही वो बलिदान दिया ।

न भूल सके थे चीनी तब,
न भूल सकेंगे आगे भी,
भारतमाता के कण-कण में,
है वही ऊर्जा, फसल नयी ।

ये कोमल पुष्प धरा के जो,
शत्रु को अब दहलायेंगे,
भारत की पावन माटी से,
ये तुमको दूर भगायेंगे ।

चाहे जितना हो दंभ तुम्हें,
चीनी तुम टिक न पाओगे,
भारतमाता के वीरों की,
हुंकारों से ढ़ह जाओगे ।

न आंख उठाकर देख इधर,
न धरती माँ को लाल करो,
हर घर में लाल धरा के हैं,
शत्रु का जो संधान करें ।

हर घर में लाल धरा के हैं,
शत्रु का जो संधान करें ।

धन्यवाद
सौम्या पाण्डेय "पूर्ति"