मुझे उस दिन झाँसी से बनारस के लिए निकलना था लेकिन मैं घर से स्टेशन जाने के लिए लेट हो गया था, मुझे ये डर था कि कहीं मेरी ट्रेन छूट न जाये...
मैं ऑटो वाले भैया को ऑटो तेज़ चलाने के लिए बोले जा रहा था ताकि में समय पर स्टेशन पर पहुंच जाऊं और मेरी ट्रेन मिस न हो, जैसे-तैसे मैं झाँसी स्टेशन पर पहुंचा!
मैंने जल्दी से ऑटो वाले भैया के पैसे दिये और स्टेशन के अंदर की ओर भागा, मैं भागा-भागा प्लेटफार्म नंबर चार पर पहुंचा ट्रेन बस कुछ सैकेंड के अंदर खुलने ही वाली थी, ट्रेन देखकर मेरी बैचेनी कुछ कम हुई मैंने जल्दी से अपना मोबाइल निकाला और अपनी सीट देखने लगा S11 में 55 था, मैं जल्दी से अपने सीट पर पहुंचा, ट्रेन के अंदर घूसते ही मैंने चैन की साँस ली दौड़ने की वजह से मैं हाँफ रहा था और पसीने से पूरा तरबतर हो गया था, मेरी धड़कनें भी ट्रेन के इंजन जैसी ही तेज़ हो गई थीं।
अब बारी थी अपनी सीट खोजने की मुझे अपर सीट मिली थी अपर सीट देखकर मैं और ज्यादा खुश हो गया क्योंकि मुझे ट्रेन के सफर में अपर सीट ही पसंद आती हैं बहुत लोग विंडो सीट के लिए रोते हैं लेकिन मुझे विंडो सीट बिलकुल भी पसंद नहीं, अपर सीट सबसे बढिया रहती है क्योंकि पूरी यात्रा के दौरान आराम से मगरमच्छ की तरह अपनी सीट पर ही पड़े रहो कोई रोकने-टोकने वाला भी नहीं आता, मैं अपनी सीट पर अपना बैग रखकर आराम से लेट गया कि तभी एक आवाज़ आई......
"जी उठिए ये हमारी सीट है" आवाज़ किसी लड़की की थी मैं उठकर बैठ गया, सामने से फिर एक मधूर सी आवाज़ आई
"अरे जल्दी उठिये ऐसे ही हम भागते-भागते ट्रेन पकड़े हैं, हालत एकदम खस्ता हो गई है हमारी"
मैंने अपना टिकट फिर चेक किया कि क्या पता जल्दी-जल्दी में मैंने गलत सीट नंबर देख लिया हो इसलिए मैंने फिर अपना टिकट देखा S11 सीट नंबर 55
"अरे सही तो है मैं तो अपनी ही सीट पर बैठा हूँ आपको कोई गलतफहमी हो गई है अपना टिकट चेक करिये फिर से" मैंने उस लड़की को समझाते हुए बोला।
"जी हम ऑलरेडी चेक कर चुके हैं आप जल्दी से उठिये हमें आराम करना है हम थक गये हैं" सामने से फिर उस लड़की ने मुझे मेरी ही सीट से उठने के लिए बोला।
"ये क्या जबरदस्ती है एक तो आप मुझे मेरी ही सीट से उठने के लिए बोल रही हैं और जब मैं कह रहा हूँ कि एक बार फिर से अपना टिकट देखकर अपनी सीट नंबर फिर से चेक करिए तो आप कर नहीं रहीं"
सीट के लिए हम दोनों की बहस जारी ही थी कि तभी नीचे से मुझे एक अंकल की आवाज़ आई
"अरे बेटा आप दोनों लोग एक बार अपना-अपना टिकट निकाल कर देख क्यों नहीं लेते कि कौन सी सीट किसकी है"
हम दोंनो ने फिर से अपना-अपना टिकट चेक करने लगे कि सामने से फिर उसी लड़की की आवाज़ आई "अरे सॉरी-सॉरी आई एम एक्सट्रीम्ली सॉरी मुझसे ही गलती हो गई सीट देखने में मैंने जल्दी-जल्दी में 58 को 55 पढ लिया, वो क्या है न मेरी ट्रेन छूटने वाली थी तो मैंने जल्दी-जल्दी में देखा नहीं मुझे माफ कर दीजिए"
वो सामने से बोले जा रही थी और मुझसे माफी माँगे जा रही थी।
"जी कोई बात नहीं जल्दी-जल्दी में होता है ऐसा" मैंने उसकी बात को काटते हुए बोला।
उसकी भी अपर सीट थी मेरे सीट के ठीक सामने वाली सीट वो अपने सीट पर बैठ चुकी थी, उसने अपने बैग से पानी का बोटल निकाला और पानी पीने लगी वो थकने के कारण अभी भी हरबराहट में थी, मैं उसे कनखियों से निहारे जा रहा था वो खुद से ही पता नहीं क्या-क्या बातें किये जा रही थी, ट्रेन अपने रफ्तार पर आ चुकी थी, ट्रेन ने झाँसी स्टेशन को न जाने कब का पीछे छोड़ दिया था।
हम दोनों लोग अपने-अपने सीट पर लेटे हुए अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त हो गये थे लेकिन मैं मोबाइल चलाकर ऊब चुका था मेरी आदत है कि मैं सफर में किसी न किसी को बातें करने के लिए खोज ही लेता हूँ लेकिन उस दिन मेरे करीब कोई भी नहीं था जिससे मैं बातें कर के अपनी बोरियत मिटा सकूं वैसे मेरे बगल में वो लड़की थी तो जरूर लेकिन मुझे डर लग रहा था कि मैं उससे बातें करने की कोशिश करूंगा तो वो मुझे चीप न समझने लगे तो मैं चुपचाप अपने सीट पर ही बैठकर इधर-उधर लोगों को देखने लगा कुछ देर बाद सामने से फिर एक मीठी आवाज़ आई "कहाँ तक जा रहे हैं आप" सामने से वही लड़की थी जिससे मैं बातें करने के लिए सोच रहा था।
"जी मुझे बनारस जाना है" मैंने जल्दी से उसके सवाल का जबाव दिया।
"अरे वाह मुझे भी तो बनारस ही जाना है, मैं भी बनारस की ही हूँ" सामने से उसने फिर बोला।
"जी मैं बनारस का नहीं हूँ बनारस में पढता हूँ मैं झाँसी से हूँ वो कुछ दिन के लिए कॉलेज की छुट्टी थी इसलिए घर आया था, वैसे आप क्या करती हैं" इस बार हिम्मत करके मैंने उससे यह सवाल किया।
"जी जैसे आपका कॉलेज मेरे शहर में है वैसे ही मेरा जो कॉलेज है वो आपके शहर में है, मैं बुंदेलखंड इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, झाँसी से इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग कर रही हूँ" उसने मुस्कुराते हुए मेरे सवाल का जवाब दिया।
"वैसे आप बनारस से क्या कर रहे हैं" इस बार उसका सवाल मेरे लिए था।
"जी में बीएचयू से बी.ए कर रहा हूँ" मैंने बोला।
"ओ वाह बीएचयू में हैं आप चलिए अच्छी बात है वैसे कौनसा इयर है आपका बी.ए का?" उसने मुझसे पूछा।
"जी ये मेरा बी.ए का सैकेंड इयर है, वैसे आपका कौनसा इयर है इंजीनियरिंग का" मैंने उससे पूछा।
"जी मेरा भी ये सैकेंड इयर ही है" उसने जवाब दिया।
ट्रेन के साथ-साथ हम दोनों के बीच ये सवाल-जवाब का सिलसिला नॉनस्टॉप चलता जा रहा था।
"वैसे आपने अपना नाम नहीं बताया अब तक" मैंने फिर हिम्मत करके उससे ये सवाल किया।
"जी आपने पूछा ही नहीं वैसे मेरा नाम साक्षी है..... साक्षी यादव" उसने हँसते हुए बोला, "वैसे आपने भी तो अब तक अपना नाम नहीं बताया" उसने बोला।
"जी मेरा नाम वरूण पाठक है" मैंने भी हल्के मुस्कान के साथ उसके सवाल का जवाब दिया।
मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि जो लड़की अभी थोड़ी देर पहले मुझसे लड़ रही थी अब वो मुझसे इतना हँस-हँस कर बातें करे जा रही थी शायद एक ही कारण था इसका वो भी मेरी तरह ही बातूनी थी।
झाँसी स्टेशन को पीछे छूटे हुए लगभग ढाई-तीन घंटे होने वाले थे और ट्रेन का अगला स्टेशन था उरई स्टेशन और थोड़ी देर में ही हमारी ट्रेन आकर उरई स्टेशन पर खड़ी हो चुकी थी...
"सुना है कि उरई स्टेशन पर बड़े अच्छे गुलाब जामुन मिलते हैं, सच है क्या?" उसने मुझसे पूछा।
"जी एकदम सही सुना है आपने, रुकिए मैं लेकर आता हूँ फिर आप खुद तय कर लिजियेगा कि यहाँ सच में गुलाब जामुन अच्छे मिलते हैं या नहीं" मैं जल्दी-जल्दी दो कटोरी गुलाब जामुन ले आया।
हम दोनों ने गुलाब जामुन खाया, हमारी ट्रेन भी उरई को पीछे छोड़ते हुए अपनी गंतव्य की तरफ बढती जा रही थी शायद ये सफर मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत सफर था, वो मुझसे बातें किये जा रही थी और मैं चुपचाप बैठकर उसकी बातें सुनते हुए उसे निहारे जा रहा था कितना सुकून था उसकी बातों में, ट्रेन भी अपनी रफ्तार में पटरी पर भाग रही थी, रात के एक बज चुके थे और हमारी बातें अभी भी जारी थीं मैं उसे देखते हुए मन ही मन सोच रहा था, काश कि ये सफर कभी खत्म न हो।
वो सो चुकी थी और मैं अपनी सीट पर लेटे-लेटे उसे निहारे जा रहा था, उसे देखते-देखते मुझे भी नींद ने कब अपनी आगोश में ले लिया मुझे पता ही नहीं चला।
"अरे उठो सुबह हो गई बनारस आ गया है तुम्हें नहीं उतरना है क्या यहाँ" ये साक्षी की आवाज थी, उसकी आवाज़ सुनते ही मैं उठकर बैठ गया, मैं अब भी कच्ची नींद में था।
"बनारस आ गया......! इतनी जल्दी कैसे आ गया बनारस" मैं अंदर ही अंदर थोड़ा दुखी होते हुए बोला।
मैंने सोचा था कि सुबह जल्दी उठकर फिर से साक्षी से ढेर सारी बातें करूंगा क्योंकि ट्रेन के बनारस पहुँचने का समय दस बजे था, मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था कि मैं सुबह जल्दी क्यों नहीं उठ पाया।
"अरे जल्दी उतरो यार वरना ट्रेन आगे निकल जायेगी" साक्षी ने अपना सारा सामान समेटते हुए बोला।
मैंने भी जल्दी-जल्दी अपना बैग उठाया और ट्रेन से बाहर उतरने लगा, हम दोनों अब ट्रेन से वाराणसी कैंट पर उतर चुके थे।
हम लोग स्टेशन के बाहर निकल ही रहे थे कि साक्षी मुझे छोड़कर सामने दौड़ने लगी, मैंने सामने की ओर देखा उसे स्टेशन पर लेने उसके पापा आये हुए थे मैं वहीं रूक गया और वो अपने पापा के साथ जाने लगी मन तो किया कि जाकर उसे पूंछ लूं कि "तुम्हारा घर कहाँ है?" लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हुई न तब और नाहि ट्रेन में, उसने मेरी तरफ देखकर 'बाय' का इशारा किया और अपने पापा के साथ जाने लगी, मैं उसे खड़े होकर जाते हुए देखे जा रहा था वो मेरी आँखों के सामने से ओझल हो चुकी थी, सफर के साथ ही मेरी ये छोटी सी लेकिन खूबसूरत कहानी खत्म हो गई।
तभी.... मेरी कानों में आवाज़ पड़ी "लंका बेच्चू..... लंका बेच्चू....." मैं भी मुस्कुराकर अपनी होस्टल की तरफ निकल पड़ा।
समाप्त....🖤
✍️ मंटू

5 टिप्पणियाँ