रुक ना जाए
जिज्ञासा मेरी

निरंतर बहाव में
ये है जरुरी

हो चाहे जितनी भी
अड़चनें
साथ खड़ा यदि
ना हो कोई

तो अकेले चलना ही
है सही

रुक ना पाए
कलम मेरी
जिज्ञासा बहुत है अभी

हंसने वाले तो है सभी
मार्गदर्शन ‌कराने  वाले
एक आध ही सही

ललक होगी इतनी की
बोलेगी कलम मेरी

रुकना नहीं है कभी
प्रेम सी सजी प्रिया हो
तो रोशनी बन कर
चमको कभी

श्रृंगार हूं मैं प्रेम का
तो भावनाओं से हूं पली-बढ़ी
आंसुओं का शैलाब है यदि मुझमें
तो बहेगा पन्नों पर ये भी कभी

एक चिंगारी है सीने में
तो दहकेगा कभी न कभी

अपूर्ण हूं मैं इस लिए
पूर्णतः की आश लिए
एक बहाव बनना है जरुरी

जिज्ञासा बहुत है अभी
लिखना रहेगा जारी

साथ हैं आप सब तो सही
या नहीं हैं  साथ मेरे तो
और भी सही

जिज्ञासा मन में है अभी
कभी प्रिया, तो कभी रोशनी और
धारा बन बहाव में रहना है जरुरी



                प्रिया