"नहीं... मैं आज कहीं भी नहीं आ सकती पापा भी बनारस आये हुए हैं, तुम अभी 1-2 दिन तो रहोगे ही न यहां पर मैं तुमसे कल या परसो मिलती हूँ पक्का तब तक पापा भी चले जायेंगे", ये बोलकर आरूषि ने जल्दी से कॉल कट कर दिया।
"उसने ऐसे आने से मना क्यों कर दिया, कहीं ऐसा तो नहीं कि वो मुझसे मिलना ही नहीं चाहती हो लेकिन उसने तो कहा था मुझसे कि तुम जब भी बनारस आओगे मैं तुमसे ज़रूर मिलूंगी" आरूषि की ये बातें सोचते हुए अस्सी घाट की सीढियों पर बैठा धीरज, फोन में आरूषि का नंबर देखे जा रहा।
ये धीरज का दूसरी बार बनारस आना हुआ था इससे पहले वो एक बार और बनारस आ चुका था तकरीबन 2 साल पहले लेकिन तब वो सिर्फ किसी परीक्षा की वजह से बनारस आया हुआ था बस, इस बार उसके बनारस आने की वजह कोई परीक्षा नहीं थी बल्कि आरूषि थी।
धीरज, मगध यूनिवर्सिटी के बी ए थर्ड इयर का छात्र था इसके साथ-साथ वो पटना में रहकर कॉम्पिटिटिव इग्जाम्स की तैयारी भी किया करता था, उसकी और आरूषि की मुलाकात फेसबुक पर हुई थी और वो एक साल से एक दूसरे को जानते थे लेकिन वो दोनों कभी मिले नहीं थे, दोनों साहित्य प्रेमी थे शायद इसलिए फेसबुक पर मिलने के बावजूद भी दोनों को एक दूसरे से इतना गहरा लगाव हो गया था।
वैसे तो आरूषि भी सीतामढ़ी, बिहार से थी लेकिन वो पिछले 2 साल से यहीं बीएचयू से अपना बी ए कर रही थी।
यहाँ अस्सी घाट पर गंगा आरती शुरू हो गई थी, धीरज ने बहुत सुना था बनारस की गंगा आरती के बारे में लेकिन कभी देखा नहीं था, उसकी बहुत चाह थी बनारस की गंगा आरती देखने की और आज उसकी चाह पूरी भी होने जा रही थी लेकिन फिर भी वो दिल से खुश नहीं था क्योंकि वो आरूषि से नहीं मिल पाया था, गंगा आरती खत्म होने के बाद भी वो बहुत देर तक वहीं अस्सी घाट की सीढियों पर बैठकर आते-जाते लोगों को देखता रहा, उसने अपनी घड़ी देखी घड़ी 9:30 बजा चुकी थी और धीरज को भूख भी लग आई थी वो वहाँ से उठकर कुछ खाने की तलाश में निकल गया उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या खाये फिर उसे एक ठेला दिखा वहाँ ब्रेडपकौड़ा और बुनिया मिल रहा था, धीरज वही खा के अपने होटल की तरफ चल पड़ा उसका होटल अस्सी घाट के एकदम पास में ही था, वो अपने रूम पर आकर चुपचाप सो गया।
अगली सुबह जब उसकी आँख खुली उसने घड़ी की तरफ देखा तो घड़ी में 9 बज चुके थे वो सोचने लगा... कि आज इतनी लेट नींद क्यों खुली, शायद कल के थकावट की वजह से ऐसा हुआ हो।
उसने अपना फोन उठाकर देखा तो उसमें आरूषि के तीन मिस्डकॉल डले हुए थे, उसने जल्दी से उठकर आरूषि को कॉल किया,
आरूषि फोन उठाते ही एक साँस में बोलने लगी- "यार कहाँ मर गये थे तुम, फोन कहाँ था तुम्हारा सुबह से तीन बार फोन कर चुके हैं तुमको लेकिन तुमने एक बार भी हमारा जवाब नहीं दिया, थे कहाँ यार हमें तो लगा हमसे मिले बगैर ही पटना भाग गये।"
"अरे मैडम थोड़ा साँस ले लो वरना मर जाओगी फिर हम किससे मिलेंगे" आरूषि की बात बीच में ही काटते हुए धीरज बोल पड़ा।
"अरे यार तो हमारा फोन क्यों नहीं उठा रहे थे तब से" आरूषि फिर बोल पड़ी...
"अरे! वो हमारा फोन साइलेंट था और ऊपर से कल के थकावट की वजह बहुत गहरी नींद में सोये हुए थे, जस्ट अभी तो उठे हैं" धीरज ने आरूषि के सवाल का जवाब देते हुए बोला।
"अच्छा सुनो पापा आज सितामढी चले जायेंगे दोपहर में 1 बजे उनकी ट्रेन है, वो बनारस हमारे कॉलेज के कुछ काम से आये हुए थे इसलिए तुमसे कल नहीं मिल सकी, तो आज शाम को मिलो फिर अस्सी घाट पर" आरूषि ने धीरज को समझाते हुए बोला।
धीरज जोर से आरूषि से 'हाँ' बोलकर खुशी के मारे उछल पड़ा।
"ठीक है फिर मिलो आज शाम को 6:30 बजे अस्सी घाट पर ही हम वहाँ पहुंच के तुमको कॉल कर लेंगे" ये बोलकर आरूषि ने फोन रख दिया.....
धीरज को अब बस शाम होने का इंतजार था लेकिन पता नहीं क्यों ये इंतजार उसको बहुत लंबा लगने लगा था, वो उठकर नहा-धो के तैयार हो गया क्योंकि उसे बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए भी जाना था, बनारस आते वक्त उसके पिताजी ने खास उसे फोन पर बोला था कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन करना मत भूलना बहुत कम लोगों को ऐसा सौभाग्य प्राप्त होता है।
विश्वनाथ मंदिर उसके होटल से लगभग 3 किलोमीटर के दूरी पर ही था वो निकल पड़ा बाबा के दर्शन के लिए वहाँ पहुंचकर उसने आराम से बाबा के दर्शन किये, वो दर्शन करके दशाश्वमेध घाट के साइड आ गया वो वहीं घाट पर बैठकर गंगा जी को निहार रहा था इतना सुकून और शाँति शायद उसने कभी महसूस नहीं किया था अपनी पूरी ज़िन्दगी में, वो वहीं डेढ घंटे बैठा रह गया गंगा जी और उनमें ठहरी नावों को देखते हुए, धीरज ने कुछ नाश्ता करने का सोचा वो वहाँ से उठकर अब गोदौलिया साइड आ चुका उसने वहीं एक दुकान में पूड़ी, सब्जी और जलेबी खाया और आराम करने फिर से अपने होटल वाले रूम पर आ गया, वो आते ही बिस्तर पर लेट गया और लेटे-लेटे कब उसको नींद ने अपने आगोश में ले लिया उसे पता ही नहीं चला।
कुछ देर बाद जब उसकी नींद खुली तब शाम के 5 बज चुके थे वो जल्दी से उठकर तैयार होने लगा और निकल पड़ा फिर से अस्सी घाट की तरफ, आरूषि के वहाँ आने में अभी पूरे-पूरे डेढ घंटे बाकी थे, तब तक उसने वहीं अस्सी पर ही चाय पिया और घाट पर आकर बैठ गया उसको घाटों से इतना लगाव हो गया था कि वो दिन भर भी घाट पर बैठ सकता था जैसे गंगा जी की लहरें उसकी आँखों को सुकून दे रही थीं, 6 बज चुके थे आरूषि के आने में अब सिर्फ आधा घंटा ही बाकी था धीरज की धड़कनें अब धीरे-धीरे तेज़ हुए जा रही थीं इसके साथ-साथ वो बेहद खुश भी था आखिर पहली मुलाकात जो थी आरूषि से उसकी ऐसे आमने-सामने।
हमेशा की तरह अस्सी उस रोज़ भी गुलजार थी, इस अस्सी घाट ने न जाने कितने लोगों को मिलते और बिछड़ते देखा होगा, इस अस्सी घाट ने ना जाने कितनी कहानियां लिखी होंगी शायद ये अस्सी आज भी एक कहानी लिखने जा रही थी कहानी धीरज और आरूषि की...
यहाँ तभी धीरज का फोन बजा, कॉल आरूषि का था उसने जल्दी से फोन रिसीव किया- "हाँ, कहाँ हो मैं अस्सी घाट पर पहुंच गई हूँ" सामने फोन में से आरूषि की आवाज़ आई,
ये सुनते ही जैसे धीरज की धड़कनें इंजन सी दौड़ने लगी उसके हाँथ-पैर एकदम से ठंडे पड़ने लगे।
"अरे! सो गये क्या फिर से, कुछ बोलोगे भी, अच्छा तुमने स्कायब्लू कलर का शर्ट पहना हुआ है क्या?" आरूषि ने धीरज से फोन पर ही पूछा।
"हाँ लेकिन तुमको कैसे पता" धीरज ताज्जुब होकर बोला।
"अरे पागल तुम मुझे दिख गये हो रूको मैं तुम्हारे पास ही आ रही हूं" ये बोलकर आरूषि ने फोन रख दिया।
धीरज खड़ा होकर यहाँ- वहाँ देखने लगा उसकी आँखें आरूषि को खोजे जा रही थीं कि तभी सामने से उसे आरूषि आती हुई दिखी, काले कलर की जींस और हल्के लाल कलर की कुर्ती पहने वो सामने से हँसते हुए चली आ रही, उसकी हँसी इतनी मासूम कि रोता हुआ बचा भी उसे देखकर मुस्कुरा उठे वो हवाओं से बाते करते हुए धीरज के करीब बढती चली आ रही थी और धीरज वहीं खड़ा उसे मंत्रमुग्ध होकर निहारे जा रहा।
"पहचाना हमको कि नहीं" आरूषि ने हँसते हुए, धीरज से सवाल किया।
"कैसी बात कर रही हो यार हम तुम्हें ना पहचाने ऐसा हो सकता है" धीरज आरूषि को निहारते हुए बोला।
"तो फिर मिल लिये न हमसे अब हम जायें" आरूषि ने धीरज को चिढाते हुए बोला।
"इतनी जल्दी भी क्या है यार, पहली बार तो मिली हो कम से कम चाय तो पी ही सकती हो हमारे साथ, और वैसे भी अभी तुमको हमे ये सब घाट भी तो घुमाना है, हम कुछ नहीं जानते इन घाटों के बारे में" धीरज थोड़ा शर्माते हुए बोला।
"चलो ठीक है फिर, तुमको चाय-सुट्टा पिलाते हैं एकदम मज़ा जायेगा तुमको" आरूषि बोली।
"क्या..... तुम सुट्टा भी पीती हो?" धीरज डरते हुए बोला।
"हाँ, सुट्टा, बियर हम तो सब पीते हैं मजा आता है एकदम, तुम भी पीकर देखो मजा ना आये तो कहना हमसे" आरूषि ने धीरज की टाँग खीचते हुए बोला।
"ना भाई हम नहीं पीते इ सब, हम तो कहते हैं तुम भी छोड़ दो अच्छा रहेगा" धीरज आरूषि को समझाते हुए बोला।
"अरे! बुधु मज्जे ले रहे हैं हम तुम्हारे, तुम तो सच मान के बैठ गये पागल हो एकदम तुम" आरूषि बोली।
ये सुनकर जैसे धीरज की जान में जान आया, "अच्छा तुम हमको घाट नहीं घुमाओगी" धीरज ने आरूषि से पूछा!
"पैदल ही घूमोगे क्या पूरे घाट" आरूषि बोली।
"हाँ तो क्या हुआ, बातें करते करते ये घाट का सफर कब खत्म हो जायेगा पता भी नहीं चलेगा यार" धीरज बोला।
"पागल 80 से भी ज्यादा घाट हैं यहां पर थक जायेंगे" आरूषि धीरज को समझाते हुए बोली।
"अरे कुछ नहीं होगा चलो तो" धीरज फिर बोला।
"ठीक है फिर यहाँ से दशाश्वमेध घाट तक चलते फिर वहाँ से ऑटो ले लेंगे तुम वहीं से हमको हमारे होस्टल तक छोड़ देना, आज तुम हमारी ऐसी तैसी करवाओगे यार" आरूषि धीरज से बोली।
"ये तुम्हारा होस्टल किस तरफ है यार" धीरज ने आरूषि से पूछा।
अरे बीएचयू कैंपस में ही है हमारा होस्टल MMV में...!" आरूषि ने धीरज को बताया।
फिर दोनों ने चलना शुरू कर दिया, अस्सी से दशाश्वमेध का ये सफर उनकी ज़िन्दगी सबसे यादगार सफर होने वाला था, धीरज नहीं चाहता था कि ये सफर कभी खत्म हो वो बस यूंही आरूषि के साथ चलना चाहता था, घाट हो या फिर ज़िन्दगी वो अब बस अपने साथ सिर्फ आरूषि को देखना चाहता था, आरूषि बोलती जा रही थी और वो सुनता जा रहा था, वो दोनों दशाश्वमेध घाट पर पहुँच चुके थे, दोनों थोड़ा आराम करने के लिए वहीं घाट की सीढियों पर अपने पैरों को गंगा जी में डुबाकर बैठ गये।
"तो फिर पटना कब निकलना है तुमको" आरूषि ने गंगा उस पार देखते हुए धीरज से पूछा।
"बस अब तुमसे मिल लिये, अब कल की ट्रेन से पटना के लिए रवाना होंगे" धीरज थोड़ा उदास होकर बोला।
"कुछ दिन और नहीं रूक सकते हो क्या?' आरूषि ने धीरज से पूछा।
"रूक तो जाते लेकिन बाउ बस दो दिन का खर्चा दिये हैं, अब हम कमाते तो हैं नहीं" धीरज मुस्कुराते हुए बोला।
"फिर कब आओगे बनारस!" आरूषि ने उदास होकर पूछा।
"बहुत जल्द" धीरज बोल पड़ा।
आरूषि ने धीरज के कंधे पर अपना सिर रख दिया और दोनों गंगा की लहरों को देखने लगे,
"प्यार करती हूँ तुमसे..." आरूषि एकदम से बोल पड़ी।
"मैं भी..." धीरज आरूषि का हाँथ पकड़ते हुए बोला।
"तो फिर बोला क्यों नहीं हमसे" आरूषि ने पूछा।
"हम तुमसे मिलकर ही बताना चाहते थे इसलिए इसका कभी जिक्र नहीं किये" धीरज बोला।
"तुम्हें पता था कि हम तुमसे प्यार करते हैं" आरूषि ने धीरज से पूछा।
"इतने भी ज्यादा बुधु नहीं हैं मैडम जितना तुम समझती हो हमे" धीरज हँसते हुए बोला।
धीरज और आरूषि..... दोनों एक दूसरे की आँखों में देखकर मुस्कुरा रहे थे और दूर खड़ा बनारस भी मुस्कुरा रहा था एक और प्रेम कहानी के आगाज़ को देखते हुए, शाम ढल चुकी थी। ❤️
समाप्त....
✍️ मंटू

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