सृष्टि की अनुपम कृति,कहलाती,
हैं, बेटियाँ......
बन गोरैया पिता के आंगन में,
चहकती फुदकती,
हैं बेटियाँ......
दे दें थोड़े साथ समर्पण,
तो आसमान में भी उड़कर,
दिखाती हैं बेटियाँ.....
प्रेम समर्पण, त्याग धैर्य,
अनुशासन में रहने का,
हुनर जानती हैं बेटियाँ.....
मीरा, राधा, सलमा, मरियम,
सभी रूपों में नजर आती,
हैं बेटियाँ........
बात आ जाएं जब अस्मत पर,
अग्नि में कूद कर जौहर अपने,
दिखाती हैं बेटियाँ....
करती है गुलजार अपने चमन को,
बहु बनकर जब, दूसरे घर ,
जाती हैं बेटियाँ.....
दो दो कुल का मान बढ़ाती,
हैं बेटियाँ.....
अपने आन बान पर जब आ जाए,
बात तो दो धारी तलवार बन,
जाती हैं बेटियाँ....
खुशकिस्मत वो बेटी नहीं,
जिसे पिता मिले,
खुशकिस्मत वो पिता हैं,
जिनके घर आती हैं,
बेटियाँ......
जिनके घर आती हैं,
बेटियाँ.....
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श्वेता कर्ण!

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