मुहब्बत का पैगाम हो या हो परदेश से आई एक बेटे की चिट्ठी। क्या दिन थे वो! जब घर में पोस्ट कार्ड आता था। 

परदेश गये पति के बिरह में, उनके पास से आया छोटा सा पोस्ट कार्ड कितना अपना सा लगता था। पहले माँ बाप को प्रणाम और सबसे अंत में जीवन साथी के नाम कुछ संदेश। 
दरवाजे की ओट से पोस्ट कार्ड को देखती वो खामोश निगाहे ! फिर जब पोस्ट कार्ड हाथ में आता तो ना जाने कितनी बार पढ़ जाती, अपने लिये लिखें संदेश को। 

कितने सहेज कर रखे जाते वो पोस्ट कार्ड ! कि जैसे कोई बहुत बहुत करीबी हो इसमें। माँ के लिए ढेर सारा प्यार, भाई बहनों के लिए दुलार, पिता के लिए सम्मान, बच्चों के लिए अरमान और अपने जीवन साथी के लिये आने वाले समय के लिए ढेर सारे सपने।। 

                     आज भी बहुत सारे पोस्ट कार्ड पड़े हैं! 
घर के पिछले हिस्से में बने कबाड़ वाले घर में। जहाँ पुराने सामानों को रखा जाता है। अब पोस्ट कार्ड बीते दिनों की बात हो गई? और उसकी जगह ले ली इस मोबाइल ने! 
पर इतना तो सच है कि जो प्यार और अपनेपन की  खुशबू उन पोस्ट कार्ड में थी वो अब के इस मोबाइल में कहाँ?? 
अब मिलों की दूरी कम होने के साथ साथ दिलों की दूरी बढ़ सी गई है शायद? 

जाने कहाँ गये वो दिन? 
अब मोबाइल के सुलझे हुए तरंगों में, बहुत से जज्बात उलझ से गये हैं।। 


     श्वेता कर्ण