एक ही पल में सारी ,खुशियां मिटा गए
जमाने भर का गम ,दामन में गिरा गए।

दिल के रिश्ते से तो, 
वो मेरे खुदा लगते थे।                काम लेकिन  एक  , बेगाने  सा  कर गए।

तारीफ में मेरी जो  ,जुबाँ  न थकती थी। 
उसी जुबां से हज़ारों , इल्जाम लगा गए।   
 
जिस मोहब्बत पर हम,कभी  नाज़ करते थे।
उसी मोहब्बत को ,सरेआम रुसवा  कर गए।

 देख नहीं पाते थे जो ,आंखों में एक अश्क़।
  कतरा कतरा आंसुओं की, धार छोड़ गए।
  
हमने तो उन्हें अपने ,दिल से ना जुदा किया।
खता क्या हुई अपनी, नजरों  से  गिरा दिए।

भरी महफिल में तारीफें,मेरे हुस्न के करते थे।
उसी चेहरे को जी भर के , बदनाम कर गए ।

काटी  हैं तमाम रातें , सिसकियों के साथ।
काश!एक सिसकी भी,कभी सुन लिए होते।

उनके एक इशारे पर, अपनी जान भी दे देते।
 घुट घुट के जीने से अच्छा,तो मर गए होते।
 
छोड़ कर यूँ चले  गए , मुड़ के नही देखा।
इससे बेहतर था ताउम्र ,तन्हा रह गए होते। 

 दूर  उनसे  हूँ  पर , उनकी यादों  से  नहीं ।
 वश चलता तो ,उसे भी साथ ले गए होते।

स्नेह लता पाण्डेय
 नई दिल्ली