रात भर श्री राम को नींद नहीं आयी। भार्या देवी सीता से मिलने का समय था तो निद्रा देवी भी कहीं दूर चली गयीं। सीता ने पूरी रात जगकल व्यतीत की। पर उसका कारण विपत्ति की संगनियों का स्नेह था। राम पूरी रात मिलन की आशा में जगे रहे। सचमुच आशा बङी बलबती है। यह आशा का अबलंबन ही था कि विपत्ति के विशाल पर्वत को पार कर लिया। दुनिया में जिसकी शक्ति के सामने टिकने का किसी का साहस न था वह संसार विजयी रावण मृत्यु शैय्या पर सो गया।

        रावण की दुष्टता के कारण उसके कैद में रही वैदेही को समाज कितना सम्मान देगा। आर्य निश्चित ही महिला को देवी रूप में पूजते हैं। पर पूजने और सम्मान करने में बहुत अंतर होता है। श्री राम इस तथ्य से परिचित थे। रह रह कर निर्दोष अहिल्या का चरित्र ध्यान में आ जाता। बेचारी न जाने कितने वर्ष पाषाण बनी रहीं। पुरुष प्रधान समाज का वीभत्स रूप राम की नींदें उङा रहा था। सीता का अपमान राम देख नहीं सकते थे। वैसे पूरे जीवन वन में गुजार सकते थे। पर भरत का प्रेम याद करते तो एक एक दिन भारी पङता। भरत जैसा भाई ढूंढे से भी नहीं मिलेगा। भरत ने कहा भी कि चौदह वर्ष होते ही यदि आपके दर्शन नहीं हुए तो मेरा जीवन ही नहीं रहेगा। और भरत केवल कहने बाले व्यक्ति न थे। इन्हीं सोचों ने राम को किंकर्तव्यविमूढ़ कर रखा था।

        प्रातः ही श्री राम की आज्ञा से हनुमान माता सीता को लेने चल दिये। लंका के हर घर में किसी न किसी तो निधन हुआ ही था। किसी का सुहाग उजङ गया तो किसी का पुत्र। कई बच्चे अनाथ हो गये। युद्ध का दुष्प्रभाव प्रत्यक्ष था। फिर भी देवी सीता को विदा कराने स्त्रियों की भीङ जमा हो गयी। सीता उन्हें मिले बिना, उन्हें सांत्वना दिये बिना आगे न बढ सकीं। सभी से मिलते मिलते विलंब हो गया। उधर श्री राम का इंतजार बढता रहा।

         संध्या काल के समय सीता की पालकी नगर से बाहर निकल पायी। रक्षकों की फौज सुरक्षा के लिये थी। खुद महारानी मंदोदरी सीता को श्री राम के शिविर तक छोङने चल दीं। वानरों की भीङ माता सीता की प्रतीक्षा कर रही थी। जैसे जैसे सीता की पालकी नजदीक आ रही थी, वैसे वैसे श्री राम का मन विचलित होता जा रहा था। उन्होंने मन ही मन जो निर्णय लिया था, उसे पुर्ण कर पाने में मन विचलित हो रहा था। पर जो भी हो, करना तो था ही। सीता के सम्मान के लिये यह आवश्यक लग रहा था। 

      पालकी से उतर कर सीता श्री राम की तरफ बढ लीं। आज वर्षों का वियोग खत्म हुआ। पर यह क्या? श्री राम के चेहरे की भाव भंगिमा तो कुछ अलग ही कह रही है। मानों श्री राम को सीता से मिलने की कोई इच्छा ही नहीं है। 

      "सीते। अभी वहीं रुको। तुम्हारी मंशा मेरी समझ में नहीं आयी। जब लक्ष्मण ने रेखा खींचकर बाहर निकलने से मना कर दिया था फिर भी तुमने रेखा लांघीं। संभव है कि वन के कष्टों से तुम व्यथित हो गयीं थीं। सामने राक्षस राज का आह्वान देख खुद को रोक न पायीं। इतना बङा उपक्रम मेने उस दुष्ट को उसकी दुष्टता का दण्ड देने के लिये ही किया था। सुर्यवंशी अपने सम्मान की रक्षा के लिये कुछ भी कर सकते हैं। मेने यह सिद्ध भी किया है। पर तुम्हें पहले की ही भांति अपनाने का मैं कोई कारण नहीं देखता हूं। "श्री राम जितनी सुगमता से यह बोल रहे थे, उनका मन उतना ही व्यथित होता जा रहा था। एक एक शव्द खुद श्री राम के मानस को घायल कर रहे थे। 

      चारों दिशाओं में हाहाकार मच गया। श्री राम का यह रूप न तो वानरों की समझ में आया और न राक्षसों के। राक्षसियों के मध्य कानाफूसी होने लगी। श्री राम के गुणों की मन ही मन पूजा करने बाले खुलकर आलोचना करने को तैयार थे। रावण की कैद में रहकर भी सीता ने हमेशा राम का नाम लिया। भगवान की जगह राम को पुजा। कई स्त्रियों का तो यह भी विचार था कि सीता को ऐसे पुरुष के पास जाना ही नहीं चाहिये। सम्मान एक द्विपक्षीय प्रक्रिया है। पत्नी और पति दोनों को ही एक दूसरे का सम्मान करना चाहिये। फिर बिना सोचे समझे इतना बङा आरोप लगाने का अधिकार पति को नहीं है। पर शायद राक्षस कन्याओं को अंदाजा भी नहीं था कि महिला को देवी रूप में पूजने बाले आर्यों की बुद्धि कितनी पुरुषवादी होती है। 

       श्री राम के शव्द देवी सीता को अंदर तक व्यथित कर गये। इन्हीं श्री राम ने अहिल्या को सम्मान दिलाया था। बिना देखे ही इन्हें पसंद कर लिया। फिर वाटिका में मुलाकात हुई। आज तक के वैवाहिक जीवन में ऐसा कोई क्षण याद नहीं है जब उन्होंने मेरा साथ न दिया हो। एक कौए ने मेरे चरणों में चोंच क्या मार दी, श्री राम ने उसे भी दण्ड दिया। अब मेरे पर संदेह कर रहे हैं। 

     "मेरे आराध्य। दशों दिशाओं, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र, वायु अग्नि की शपथ खाकर कहती हूं कि मेरे मन मंदिर में आपके अलावा किसी अन्य का स्थान भी नहीं है। आज आपने मुझपर संदेह किया है। अब इस संसार में मेरा जीवन व्यर्थ है। जलती अग्नि में खुद को भस्म करके अपना जीवन समाप्त कर दूंगी। "

      दसों दिशाओं से आवाज आयी -" राम। सीता परम पवित्र है। इन्होंने मनसा, वाचा और कर्मणा केवल आपको स्नेह किया है। इनपर संदेह निराधार है। "

    पृथ्वी, सुर्य, पवन और अग्नि ने भी सीता को पवित्र कहा। चन्द्रमा रात की बाट जोट रहा था। पर सीता ने काष्ठ का ढेर तैयार कर लिया। खुद उस चिता पर बैठकर अग्नि प्रज्वलित कर ली। सीता के साहस को देख किसी की हिम्मत उन्हें रोकने की न हुई। कई राक्षस स्त्रियां रोने लगीं। 

      धूं धूं कर जलती अग्नि में सीता विलीन हो गयीं। सीता को विलीन होते देख राम जोर जोर से रोने लगे। अग्नि परीक्षा में सीता के उत्तीर्ण होने पर उन्हें पूर्ण विश्वास था। सीता जैसी सती स्त्री तीनों लोकों में कोई नहीं है। सतियों में श्रेष्ठ देवी अनुसुइया का सीता पर परम स्नेह रहा। वह सीता अग्नि से जीवित वापस नहीं आयी, राम समझ भी न सके। सीता के वियोग में राम मूर्छित हो ही जाते यदि अग्निदेव प्रगट होकर वस्तुस्थिति न बताते। 

     "हे राम। आपकी सीता परम पवित्र है। मेने सीता की पवित्रता की गवाही दी थी। अब सीता को मेने अपनी अपनी धर्म की पुत्री स्वीकार कर लिया है। अपनी धर्म पुत्री को आपको तभी प्रदान करूंगा जब आप जीवन भर उसका सम्मान करने का वचन देंगें।" अग्नि देव के स्वर में उलाहना था। 

     राम ने हाथ जोङ लिये।
" देव। मेरी सीता परम पवित्र है। मुझे सीता की प्रीति परखने की कभी आवश्यकता नहीं है। पर यह संसार उससे अधिक निर्दयी है जितना हम समझते हैं। यहाॅ से जाने के बाद सीता की पवित्रता पर कोई संदेह न करे, बस इसीलिये यह अनधिकार चेष्टा कर बैठा। यद्यपि एक स्त्री को अपनी पवित्रता साबित करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। आप मुझे क्षमा करें। मेरी सीता मुझे वापिस कर दें। सीता बिन मैं बिन प्राण एक मृत शरीर ही हूं। "

    अग्नि की जलती लपटों में से देवी सीता बाहर आयीं। उनके तेज को देख पाना भी सभी के लिये सक्षम नहीं था। धरती और अंतरिक्ष में भी सीता की जय जयकार हो रही थी। पर जबतक अग्नि देव ने आज्ञा नहीं दी, सीता पीछे खङीं रहीं। 

   " सीते। तुम आज से मेरी धर्म पुत्री हो। मेने देख लिया है कि श्री राम का उद्देश्य केवल संसार में तुम्हारा सम्मान बढाना था। इनके मन में तुम्हारे प्रति कोई संदेह नहीं है। फिर भी आप खुद से विचार कर इनके वाम अंग में विराजना।" 

    "पिता जी। आपका कथन सत्य है। जिस तरह पति को पत्नी का प्रेम जांचने का अधिकार है, उसी तरह पत्नी को भी अपने पति का प्रेम समझने का पूरा अधिकार है। मेने श्री राम की प्रीति परीक्षा ले ली है। अग्नि में प्रवेश करते समय मेने खुद के प्रेम की शपथ नहीं ली थी। अपितु शपथ ली थी कि यदि श्री राम मुझसे प्रेम करते हैं तो यह जलती अग्नि मुझे शीतल लगे। श्री राम के मन मंदिर में मैं ही विराजती हूं। आप मुझे आज्ञा दें ताकि मैं श्री राम के वाम स्थल पर उनका साथ दे सकूं। "

    अग्नि देव की अनुमति के साथ ही सीता श्री राम के साथ खङी हो गयीं। दोनों की आलोकिक छवि का सही सही वर्णन कर सके, ऐसा कोई कवि या लेखक इस संसार में पैदा ही नहीं हुआ है। भगवान भाष्कर अस्त के समय भी प्रार्थना कर रहे थे कि भारत के आर्यों की आंखें इस प्रकरण से खुल जायें। आर्य कुछ राक्षस और वानरों से ही सीख लें। पर ऐसा होता कहाॅ है। यदि सही सीख गये होते तो आज भी लङकियों के अपमान की घटनाएं होती हैं, वह शायद न होतीं। सही बात को सिखाने में खुद ईश्वर हार गये।


          दिवा शंकर सारस्वत " प्रशांत"