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मैं पतंग हूँ! 
वहीं पतंग जिसे, 
आज जी भर कर, 
उड़ाया तुमने! 
कल से फिर मुझे, 
इस दिन का, 
इंतजार रहेगा! 


अरे दिल तोड़ने वाले, 
क्या कहूँ अपनी व्यथा! 
तेरे भाव सानिध्य पाने, 
के लिए, क्या क्या मैंने, 
जतन किया! 


सच्ची हूँ, सत्य की चाह, 
मैंने आदतन किया! 
बोल -पुकार कर, 
थक चुकी , 
मैं तो अब "निः शब्द"हूँ! 


पतझड़ में सूखे पत्तों की तरह, 
सुख चुकी मैं दिशा रहित! 
संग तेरी खुशी देखकर, 
मैं तो अब "स्तब्ध"हूँ,
हाँ मैं अब "निःशब्द" हूँ! 


आओ मेरे सभी हृदय, 
तोड़ने वाले, 
दिखा के मुझे असंख्य, 
स्वप्न, त्वरित मुंह, 
मोड़ने वाले! 
मैं निस्तेज निष्प्राण, 
पड़ी हूँ धरती पर कट कर! 


प्रयोग करो मुझ पर, 
शल्य क्रिया करो मेरे, 
हृदय के साथ, 
तुम्हारे लिए मैं "सर्व दा" उपलब्ध हूँ! 
देखो मैं, अब "निःशब्द " हूँ!! 
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श्वेता कर्ण!