लाती थी तिनके चुन चुन कर ,
बनाया एक घोंसला पेड पर।
चुगकर लाती थी दाने,
दो नन्ही चिडियाँ को खिलाने ।
बचाकर रखती थी
सबकी बुरी नजरों से,
लेती थी बलाएँ, देती थी दुआएँ ।
सींच। , बड़ा किया
उड़न। सिखाया, किस्मत बनाया,
पर पता न था
जब सीख जायेंगे उड़न।
एक दिन उड़ जायेंगे,
छोड़ कर चले जायेंगे,
कर जायेंगे घोंसला सूना ।
सुनापन उसकी आंखों की भी,
बार बार पुकारती, बुलाती चिडियाँ
न लौटते बच्चे, न लौटा बचपन
उड़न। जो सीख लिया
घोंसले की क्या फिकर।
फिर अपना एक नया घोंसला बनायेंगे
फिर वही कहानी दुहरायएंगे।।

                             ----डॉली मिश्रा✍️