भीड़ भाड़ वाला रिहायशी इलाका, जब देखो लड़कियों का हुजूम लगा रहता वहाँ, लड़कियाँ तितलियों
जैसी मंडराती रहती वहाँ.... 
दरअसल वहाँ लड़कियों का कालेज जो था, सो लड़कियों की भीड़ लगना भी स्वभाविक है... 
चाट -पकौड़े के ठेले, इडली -डोसे का ठेला और भी कई
चीज़ें लड़कियों के हिसाब से बहुत कुछ सामान मिलता था -
सो भीड़ लगना भी लाज़मी है.... 

वो लड़का एक तय समय पर आकर, वहाँ एक तरफ़ खड़ा 
रहता था, उसी समय ऽऽ कालेज के गेटके सामने एक 
रिक्शे रुकता आकर, उसमें से वो लड़की बड़ी मुश्किल में 
अपनी छड़ी के सहारे नीचे उतर पाती थी....... 

ये तो रोज का रुटीन उसकी दिनचर्या में शामिल हो चुका 
था, लड़के का नाम था मोहित...... 
देखने में सुंदर सजीला जवान, अलग ही नज़र आता 
अच्छे घराने से ताल्लुक़ होगा..... 
उसका ध्यान गया वो लड़की रिक्शे से उतर रही है...... 
दूर से देखने में तो बड़ी ही सुंदर, रंग दूधिया सफ़ेद, 
इतने में ही देखा मैंने उसकी छड़ी नीचे गिर गयी, तभी 
मैं फुर्ती से दोड़ा, वो गिरने ही वाली थी..... उसे सम्हाल 
लिया, उसकी छड़ी उठाकर हाथ में पकड़ा दी..... 
उसने मुझे धन्यवाद दिया और गेट के अंदर चली गयी -

उस दिन मैंने उसे पास से देखा बहुत सुंदर, तीखे नयन 
नक्श, लेकिन चेहरे पर मायूसी....... 
बिना छड़ी के वो चल नहीं पा रही थी, छड़ी ही उसका 
सहारा थी, अब कम से कम मुझे देख कर उसके चेहरे पर 
मुस्कुराहट दिखने लगी, में भी उसे देख कर मुस्कुरा देता -

आज जब वो दोपहर को कालेज से लौटी, उसका रिक्शा 
नहीं आया था, सो मैं उसके पास पहुँच गया.... 

मैंने बोला दूसरा रिक्शा कर दूँ आपके लिए.....? 
वो बोली नहीं ऽऽआता ही होगा वो...... 
मैंने सोचा आज तो नाम पूंछ ही लेता हूँ, सो मैंने पूंछा -
आपका ऽऽनाऽम........
उसने बताया..... वंदिता... बहुत सुंदर नाम है..... 
अब क्या बात करुं एकदम कुछ समझ ही नहीं आया -
मैं थोड़ा सकपका भी गया था सो ऽऽ खैर...... 

चलो कुछ तो बातचीत शुरु हो पायी, उसका रिक्शा आ 
गया तो वो चली गयी, हाँ मेरी तरफ़ देख कर उसने हाथ हिलाया और मुस्कुरा दी.... 
उसकी मुस्कुराने की अदा से तो मेरे सारे तार झनझना 
गये, जैसे मेरे ऊपर एक अजीब सी खुमारी छा गयी हो -

दूसरे दिन भी मैंने आफिस से बंक मारा और पहुँच गया 
अपने समय से, जैसे ही वो गेट के बाहर आयी, तो मैं 
उसके पास आकर खड़ा हो गया..... 
आज तो वो खुद ही बोली -आपने अपना नाम नहीं 
बताया !! आपने पूंछा ही नहीं...... 
सो वो हँस दी बोली ऽऽऽ। अब तो बता दो.... 

मोहित नाम है मेरा, हम दो भाई हैं, मैं बड़ा हूँ, छोटा भाई 
अभी बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा है, और माँ है बस छोटा सा 
परिवार है हमारा -ये सब मैं एक सांस में बोल गया.... 
जैसे कोई रट्टू तोता हो....... 
वो बोली अऽ रेऽऽ रुको तो ऽऽआप तो...... 
मैंने बोला आप का पाँव ठीक नहीं हुआ अब तक.....? 
उसके चेहरे पर फिर उदासी छा गयी....... 
थोड़ा रुकी वो ऽऽ फिर बोली -जन्म से ही ऐसा है..... 



दोनों की मुलाकातें बढ़ने लगीं ,प्यार अब परवान चढ़ने 
लगा था ,उस दिन वंदिता का बड़ा ही अच्छा मूड देख 
कर -अचानक मैंने बोला वंदू मुझसे शादी करोगी....... 
वो थोड़ी देर तो चुप रही, कुछ बोली नहीं.... 
कुछ तो बोलो यार..... ऐसे चुप मत रहो...... 
वो बोली मुझ पर तरस खाकर कह रहे हो न....... 
तुम ऐसा कैसे सोच सकती हो......? 

मैं प्यार करता हूँ तुमसे, सच्चा प्यार..... 
वो बोली -शादी के बाद दो -चार दिन में ही प्यार-व्यार
सब धरा रह जायेगा....... 
नहीं वंदूऽऽऽ मैं सही में तुमसे प्यार करता हूँ, तुम्हें तो पता भी नहीं है, मैं कबसे वहाँ पर खड़ा -खड़ा रोज ही तुमको 
देखता रहता था........... 

वो बोली ठीक है, फिर तुम अभी चल सकते हो मेरे घर -
मैं भी तुरन्त तैयार हो गया, और उसके साथ में चला गया...

उसने मुझे बाहर छोटे से हालनुमा कमरे में बिठाया -
वो अंदर चली गयी..... 

थोड़ी देर बाद उसके पापा -मम्मी आ गये,उन्होंने मुझसे 
सब बारीकी से पूछताछ करी..... 

बोले ठीक है बेटा कल ही हम आपके घर आकर आपके 
मम्मी -पापा से बात कर लेते हैं........ 

बिल्कुल -बिल्कुल आप आ जाईये कल, किस समय 
आप आयेंगे बता दीजिए, जिससे मैं घर पर मिल सकूं -

बेटा मैं शाम के ही समय आँऊगा,आप अपने घर में सब 
सच -सच बता देना..... 
मैं झूठ पर अपनी बेटी का घर नहीं बसाना चाहता हूँ,
कल को कुछ समस्या खड़ी हो जाये...... 
अब मैं आपसे इज़ाजत चाहूँगा, कहकर मैं निकल लिया... 

घर पहुँच कर माँ को सब सच-सच बता दिया, माँ का तो 
पारा चढ़ गया, मेरे समझाने पर, धीरे -धीरे शांत हुयीं..... 

दूसरे दिन वंदिता के पापा आये, उन्होंने सारी बातें सही -सही करीं दोनों पक्ष की सहमती हो गयी..... 

शादी की तारीख पक्की करके, धूमधाम से शादी हो गयी -
हाँ ये जरुर है- फेरे के समय लड़की को छड़ी लेकर चलते देखा तो ऽऽ खूब सब लोग........ 
आपस में खुसुर -पुसुर करने लगे -

मोहित को जैसे ही समझ में आया, उसने तुरन्त वंदिता के हाथ से छड़ी लेकर अलग रख दी...... 
फिर खुद का सहारा देकर सप्तपदी की रस्म पूरी करी.... 
कुछ दिन सब बढ़िया से साथ में रहे, फिर मोहित का 
तबादला दूसरे शहर में हो गया..... 
सो वो वंदिता के साथ रतलाम में आकर रहने लगा,
उसको आफिस से क्वार्टर पहले ही मिल गया, जिससे
उसे कोई परेशानी नहीं हुयी....... 

थोड़े ही दिन में वंदिता ने अच्छे से घर को सम्हाल लिया, 
व्यवस्थित भी कर लिया, जो भी उन्हें देखता कोई तो उसे बेचारा बना देता, कोई तारीफ़ करे बिना नहीं रहता..... 
इसे कहतें हैं सच्चा प्यार, वास्तव में दोनों में प्रेम तो था ही 
एक -दूसरे के प्रति सामंजस्य की भावना भी थी.... 
दोनों ही एक -दूसरे का बहुत ध्यान रखते थे..... 

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               कहानीकार -रजनी कटारे 
                    जबलपुर (म. प्र.)