मन की वीणा जब बजने लगी
डोरी पतंग में बंँधने लगी
अब सर्द रात को हुआ अंत
लो आया फिर से नया बसंत।
सरसों के पीले खेतों में
तितली बन के मन उड़ने लगा
जीवन की आपाधापी में
मन-भँवर कहीं जब खोने लगा
कानों में आ कोई कहने लगा
अब बेचैनी का करो अंत
लो आया फिर से नया बसंत।
बसंत के विविध रूप
( भाग 2)
प्रकृति अंगड़ाई लेती है
मन वीणा झंकृत होती है
जब प्रेम की कलियांँ खिलती हैं
एक नई चेतना मिलती है,
तब मंद बयार सी बहती है
इजहार प्रेम का करती है
संबंधों की कन्नी सकती है
उम्मीद की डोरी बंँधती है
मन- पतंग गगन को छूती है
ऋतु बसंत प्रेम की होती है।
( भाग 3)
कब सर्द रात का होगा अंत
कब आएगा एक नया बसंत?
संबंध की चादर काँप गई
जब तीव्र स्वार्थ की हवा चली
अंतर्मन में एक टीस उठी
रिश्तो की ठंडक बढ़ने लगी
क्या कोई आग जलाएगा?
संबंधों को गरमाएगा
हर तरफ यही तो बात चली
गांँवों- कस्बों में गली -गली,
कब सर्द रात का होगा अंत
कब आएगा एक नया बसंत।
मीनू त्रिपाठी

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