शिक्षक  शिक्षा  दान  कर , गढ़ते  कर्णाधार ।
सकल प्रगति अरु देश का,शिक्षा ही आधार।।

मात  पिता मम है गुरू , पहले  करें  प्रणाम ।
चरण  कमल  नत  वंदना , मेरे  चारो धाम ।।

गुरू  चरण  सर  है   झुके , वंदन  बारम्बार ।
जगत गरल की पोटली,गुरू अमृत की धार।।

गुरू देव से है बड़ा, महिमा  कहि ना  जाय ।
करते  देवा  वंदना ,चरण  शरण  मन भाय।।

शिक्षक जलता दीप ज्यों,नित्य करे उजियार।
सहता  कष्ट  अपार है , करते गुरु उपकार ।।

ज्ञान नहीं  है गुरु बिना , मिले  नही सम्मान ।
अज्ञानता  है पाप सम , होत बड़ा अपमान।।

गुरु की  निंदा  ना करें , होता  नरक समान ।
सकल जगत तम है  मिटे , देते गुरु है ज्ञान ।।

सारे जग को ज्ञान दे, गुरू  गुणों की  खान ।
ज्ञान पुंज मन में भरे , भरते तन नव जान ।। 

दम्भ द्वेष  सब दूर हो , मिटे  सर्व अभिमान ।
शीश दिये जो गुरु मिले,सस्ता तो भी जान ।।

कुंभकार  जस  होत  है , मिट्टी   दे आकार ।
ज्ञान दीप जग जल उठे,सपना  हो साकार ।।

रचनाकार  प्रवीण कुमार ठाकुर
*पतोरा,छुरिया,राजनांदगांव ,छत्तीसगढ़* ।