चाहने वालों से मुकरकर
कलंको के इसारें भी ढ़ूढ़ा 
हाय रे अभागा किस्मत, 
सबको तुने लूटा.....

जो पग बंधन था धरती पर 
सब कुछ मुझसे छुटा 
हाय रे अभागा किस्मत, 
सबको तुने लूटा.....



        प्यार की आँगन,"चिकनाया" था मैं 
        जैसे 'रैन' बसेरा 
        ऊजार दिया नव-नवेली की माँगें
        शौख-सिंगार सब लूटा 
        हाय रे अभागा किस्मत,
        सबको तुने लूटा.....



मेरा 'भाग्य' बनाया भी तू ही
पनपे मंगल की डेरा 
ढीठ कमान सी बनते ही 
'काल' चक्र में घेरा 
हाय रे अभागा किस्मत, 
सबको तुने लूटा 


    
        नि:सहायों की एक-जुट में
        बर्बादी की कहर सी उमड़ी 
        षड्यंत्र बना खंजर विकराल 
        लूढ़क गई कंकाल में 
        हाय रे अभागा किस्मत,
        सबको तुने लूटा.....
      


उन 'लम्हों' की याद में 
सब,किस्मत पर छोरा
लटक गईं मर्यादाओं के सिर
जैसे,टहनी से झूला
हाय रे अभागा किस्मत,
सबको तुने लूटा.....



        'पत्थर' पर उत्कृष्ट ये जींवन
         बना पत्थर का 'देह'
         बहते 'आँसूओं' की गंगा से 
         धूल गया 'विष-अंग' भी झूठा
         हाय रे अभागा किस्मत,
         सबको तुने लूटा.....



गुप्त से हमको हँसाके
'पिरित' मन को मोहा
अँधकार की अग्नि में
चुपके-चुपके आयीं 'ठिठुरती' हवा की झोंका
हाय रे अभागा किस्मत,
सबको तुने लूटा.....



       बूँद-बूँद की नाप यहाँ है 
       'मूल्य-भाव' तो आंका नहीं 
       उठना चाहा 'बादलों' से ऊपर
       'स्वर्ग' जाना,किस्मत ने रोका
       हाय रे अभागा किस्मत,
       सबको तुने लूटा.....




          लेखक:-विकास कुमार लाभ
                      मधुबनी(बिहार)