नक्षत्र लोक में सजे हुए हैं,
संज्ञा प्रेम से अलंकृत हैं।
उत्तान व्योम के तारा मंडल में,
मधुर स्मृतियों से बसे हुए हैं ।

जीवन में कितने लोग मिले ,
गुण, अवगुण, का सामंजस्य लिए।
उनके समक्ष ठहर न सके
चाहे हों असीमित प्रभाव लिए।

हम सब स्वजनों के अति प्रिय थे।
अति विशिष्ट मेरे वह अग्रज थे।
परिवार धरा की धुरी थे,
माता-पिता की दृष्टि पूरी थे।

ओजमयी सुमधुर वाणी थी,
अद्भुत मेधाशक्ति लिए।
नैनों में अनंत आत्मविश्वास,
मानो हो वशीकरण मंत्र लिए।

व्यसनों से निर्लिप्त सदा,
लालच उन्हें छू तक ना सके थे।
काजल कोठरी परिवेश में,
वे कीचड़ में धवल कमल से थे।

सुगंधित पुष्पों के मधुबन से,
अनुपम छवि की छँटा बिखेरे।
मुखर राग में मधुर वचन,
भव्य काव्य, अलंकार निखारे।

पर सेवा में तत्पर सदैव,
पर पीड़ा से सदा व्यथित।
परहित सार के अनुचर,
कर्म पथ पर अग्रसर नित।

प्रतिभा भरी कूट-कूट कर,
अथाह ज्ञान, सागर सा क्षेत्र।
अपूर्व, अवर्णनीय, उत्कृष्ट विचार,
मानो सरस्वती के हों वरद पुत्र।

नामनुरूप अनुराग के पर्याय,
रंध्र-रंध्र में प्रेम बसा।
सुशीला भाभी माँ के संग,
वैवाहिक जीवन मधुर रहा।

दोनों जब साथ मेंं चलते थे,
लोग ठगे देखते रह जाते।
प्रेम और सौन्दर्य को,
जब एक साथ प्रमुदित पाते।

कैसे वर्णित करूँ गुणों को,
शब्द नहीं निज शब्द कोष में।
चलचित्र भाँति तैरती हैं।
स्मृतियां उनकी उर अन्तर में।

विधाता के थे अनुपम कृति,
उनको क्षणभंगुर जीवन दिए।
सुनने उनके आदर्श वचनों को।
निज लोक, अल्पायु में बुला लिए।

जब उनका था गमन हुआ।
हृदय व्यथित अति रहता था।
लगते थे हम अनाथ जैसे।
माँ-पिता ,भाभी को देख हिय फटता था।

कहते है जीवन रुका नहीं है,
किसी के बिछुड़ जाने पर।
लेकिन हम जीते हैं आज भी,
उनकी स्मृतियों को लेकर।

यह रचना मेरे प्रिय अग्रज स्वर्गीय प्रेम शंकर पाण्डेय को समर्पित🙏🙏🌸🌸
स्नेह लता पाण्डेय
         नई दिल्ली