पता नहीं क्या कहती हैं
ये हाथों की रेखाएं
कहीं ओझल तो 
कहीं धुमिल सी
नजर आती हैं
देखो रेखाएं
किसकी बनी है
हाथों में रेखाएं
साथ दे दें जो समय
पर वही होती हैं
जीवन की रेखाएं

पता नहीं क्या क्या
कहती हैं 
हाथों की रेखाएं
क्यों नही सच्चाई को समझाती
हैं रेखाएं
क्या ‌ अजनबीयों से भी 
मिलाती हैं यही रेखाएं

सुना है पुरा जीवन
बताती है रेखाएं
बिना कर्म के कुछ
नहीं देती हैं ‌रेखाएं

कर्म से चलती है जीवन
परिस्थितियां दिखला देती हैं दर्पण
जो बदला गया वो है मौसम
थामकर हाथ जो निभाएं
वही है समझ जाओ
जीवन

चाहने वाले हजारों
हैं पर है आकर्षण
समझाती हैं क्या
हाथों में नजर
आती ये रेखाएं

अनुभव बनती है 
हाथों की रेखाएं
कर्म बदल देती हैं
सारी रेखाएं  ‌।                   


    प्रिया ✍️