ज़ख्म जब मिलते हैं बहुत मुझको ,
तेरी यादों को मलहम बना लेती हूं ।
रिसते हुए घावों पर,
गर्म अश्कों को लगा लेती हूं !!
यूं तो सह लेती हूं बहुत कुछ लेकिन,
बेपरवाही सही नहीं जाती
खुद ही जूझ कर खुद से ,
होठों पे मुस्कान सजा लेती हूं !!
कोई पूछे या ना पूछे तबियत अपनी ,
बनके हकीम खुद की
हुकूमत चला लेती हूं !!
यूं तो नजर आती नहीं खुशियां मुझको,
अंधेरों से निकलने के लिए
शमा खुद ही जला लेती हूं !!
तुम होगे बहुत काबिल दुनिया के लिए ,
मैं खामोश रहकर ही कदमों पे
जमाने को गिरा लेती हूं !!
जब भी आता है बेरुखी पे गुस्सा मुझको,
तेरी ही तस्वीर को
सीने से लगा लेती हूं!!
कोई दूर हो या पास
ये मंजूर ए खुदा होता है,
तू हरदम है मेरे साथ
ये एहसास जगा लेती हूं !!
मरने लगती हैं जब
हसरतें दिल की ,
लगा कर पंख ,तेरी यादों से
हवा लेती हूं !!
गिराने में तो कमी की ना किसी ने मुझको ,
लड़खड़ा कर है सही
पर जीने का मज़ा लेती हूं !!
कीर्ति चौरसिया
जबलपुर (मध्य प्रदेश)

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