फ़िर आज लेखनी ठिठक गई, पूछा कविता से प्रश्न वही।
क्यों करती व्यर्थ प्रयास वही, क्यों तू हर बार अपूर्ण रही।।
क्यों तू स्याही से खींच रही, अभिलाषाओं का आसमान
टूटे तारों से मांग रही, क्यों अंधकार में कीर्तिमान
फिर बिखरे जीवन दृश्यों को, क्यों तू पन्नों में बांध रही।
क्यों करती व्यर्थ प्रयास वही, क्यों तू हर बार अपूर्ण रही।।
भावों के रंगों से मन पर, जो रची नयी वो भोर कहां
तूलिका लाई अश्रु भरकर, तेरी उषा में रंग कहां
निर्मम शब्दों के सागर में, क्यों तू भावों को खोज रही।।
क्यों करती व्यर्थ प्रयास वही, क्यों तू हर बार अपूर्ण रही।।
शब्दों की अदला बदली में, कितने पन्ने बरबाद हुए
चढ़ सही गलत की नौका पर, कुछ डूब गए कुछ पार हुए
क्यों परिवर्तन की लहरों में, ओझल स्थिरता ढूंढ रही।।
क्यों करती व्यर्थ प्रयास वही, क्यों तू हर बार अपूर्ण रही।।
नित नीति धर्म के बंधन में, रहना तेरा व्यवहार कहां
नियति के पार उतरने में, विश्राम तुझे स्वीकार कहां
इस मरुभूमि की पोथी पर, क्यों रच बसंत का चित्र रही।।
क्यों करती व्यर्थ प्रयास वही, क्यों तू हर बार अपूर्ण रही।
क्यों तू हर बार अपूर्ण रही..........✍️🙏🌅🌄
ऋतु बाजपेई

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