कितने लोग खा खा के मरे।
कितने तो फिर पी पी के मरे।
कुछ तो कमा कमा के मरे।
कहो ज़रा कितने जी जी के मरे।
आये दुनिया में जीवन लेकर।
जीना ही था यहाँ खुश हो कर।
तकदीर तो है तेरी रंगीन मगर।
फिर भी प्यार की कमी के मरे।
दुनिया के झमेले में घूमे कई।
बाबाओं की चौखट चूमे कई।
घमण्ड की नींद में सोये कई।
झूठो की सोहबत में जी के मरे।
परवाह गर दौलत की न हो।
दिलमें तेरे नफरत भी न हो।
दुश्मनी की जिसे चाहत ही न हो।
तभी कुछ मारे ख़ुशी के मरे।
दिलमे जो भी था कुछ बोल सके
डरते नही वोही जिगर खोल सके
दुःख था मन में न वो बोल सके
इसी लिये कई होठ सी के मरे।
फिरोज दहिवाला

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