बूढी आँखो के सामने बेरुखी से गुजर जाए
जिज्ञासा वश पूछो तो अपने ही बच्चे चिड़चिड़ाए
दुनिया के सामने हंँस-हंँसकर बतलाए
बूढ़ा हो गया हूँ ना
इसलिए मेरे समीप कोई ना आए
बूढी आँखे तरस जाती है अपनो के स्नेह के लिए
थके कँधे पे हाथ रखकर कह दे कोई" मै हूँ न"
आतुर मन इंतजार मे दिन महीने साल गुजरते जाए
बूढी आँखे खुले आसमां के तले घूमना चाहे
सब चले जाते है घूमने अकेले
बूढी आँखे घर का चौकीदार बन जाए
मनुहार जिद करके पंडितों को हो जिमाते
बुढ़े माँ बाप के लिए मनपसंद रसोई न बनाकर खिलाते
बूढे माँ बाप थोड़ा सा सानिध्य समर्पण है माँगते
जो दिया है वही तो हम सबसे है चाहते
शिल्पा मोदी✍️✍️

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