जब हम छोटे थे 
तो एक लाइन सुनते थे 
भगवान बल बुद्धि विद्या दो 
लगता था जब सब भगवान ही देते हैं 
तो माँ सरस्वती, दुर्गा, लक्ष्मी 
क्या करती होंगी 
ये तो बहुत बाद में समझ आया 
सब एक दूसरे के पूरक हैं 
तो हे माँ हम बड़े हो कर 
क्यूँ भूल जाते हैं कि 
इंसान भी तो एक दूसरे के पूरक ही है 
 अकेला इंसान सब कुछ नहीं कर सकता 
फिर क्यूँ सिर्फ मैं, मेरा ही होता है 
मिल कर ना घर ना सामाज चला पाते 
एक दूसरे की राह रोकना 
कहीं वो मेरे से आगे ना निकल जाए ज़्यादा नाम कर जाए 
चाहे जन हित के कार्यों में बाधा ही रहे 
लेकिन अपना अहम बरकरार रहे 
बस इसी उलझन में बने काम 
बिगड़ जाते 
आओ आज हम स्वयं को बदले
हम बदले तो समाज बदलेगा 
एकता का बल जब समझ जाएंगे 
बुद्धि, बल, धन 
सबको एक समान ही मिल जाएगा 
घर , समाज और देश सब उन्नति की राह पर होंगे 

 

                        अन्जू