सुप्त पड़े थे जो, प्रिय के विछोह में,
देखकर प्रिय का मुख मण्डल,
मन की वीणा के स्वर झंकृत हो गए।
कुम्हला चुके थे भाव जो,
हो स्नेह से वंचित, थे आभाव जो,
प्रीत भरे नयनों से अभिसिंचित हो गए।
खिल खिला उठे अधर राग से,
झुक गए नयन लाज से,
आशाओं के पुष्प पल्वित हो गए।
निशा आज है बहुत ओज से भरी,
चंद्रिका है ज्योतिसना से सजी,
देखकर अनुपम छटा मन के सारे दीप प्रज्वलित हो गए।
जो प्रियतमा ने मुँख से हटाए केश,
छा गया चहुँ ओर तेज,
यों लगा रवि एकसाथ कई उदित हो गए।
अंजू दीक्षित,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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