शिवम का बचपन से एक ही सपना था बहुत बड़ा आदमी बनने का गाँव से दूर शहर में बसने का ,जहाँ पर सारी सुख सुविधाओं से युक्त जीवन यापन कर सके वह अक्सर अपने दोस्तों से कहता भी एकदिन देखना मोटर से घूमूँगा और कभी कभी तुम्हें भी साथ घुमाया करूँगा ।
सभी उसकी हँसी बनाते मुंगेरीलाल के से सपने क्यों देखता है तू जो हैं क्या कम है तेरे बापू के पास अच्छी खासी जमीन मकान और परिवार भी छोटा सा एक अपना ट्यूवेल , बैलगाड़ी अच्छे अच्छों पर नहीं अपने बापू के साथ काम कर ।
वो गुस्सा होकर कहता तुमने अभी कुछ देखा है जो जानो कुँए के मेढक ही रहना ।
अच्छा चलो विद्यालय आ गया शिवम और उसके सभी दोस्त आठवीं के छात्र थे पढ़ने में शिवम सही था ।
पर उसके सपने आसमान को छूते , खूब मन लगाकर पढ़ता विद्यालय के मास्टर भी तारीफ करते तो उसके बापू सा का सीना चौड़ा हो जाता था।
पड़कर जब शिवम घर पहुँचा तो घर पर दो चार जन ज्यादा दिखे होगा कोई बापू से मिलने वाला यही सोंचकर माँ के पास अन्दर पहुँच गया।
माँ मुस्कुराती हुई आ गया तो चल जल्दी से पाठशाला के कपड़े उतारकर नए कपड़े पहन ले।
क्यों नए क्यों कहीं जा रहे क्या।
न जा नहीं रहे बाहर मेहमान न दिखे तुझे ,
हाँ दिखे वो तो आते रहते हैं उसमें नया क्या और नए कपड़े पहनने जैसा कुछ भी नही दिख रहा मुझे।
तभी बापू आ गए अरे यह तैयार न हुआ अभी जल्दी कर भाई मुहूर्त निकला जा रहा है।
कैसा मुहूर्त ।
जो कह रहा कर ज्यादा समझने की जरूरत नही तुझे समझा।
पिता के सामने वो खामोश हो गया और चुपचाप नया कुर्ता पजामा अचकन पहन ली।
तभी माँ ने आँगन में सुन्दर चौकी सजाई और उसपर उसे बिठाया कुछ पुरुष उसके हाथों में फल मिठाई रुपये रख दिए।
सभी बहुत खुश थे सबसे ज्यादा माँ बापू कुछ कुछ तो समझ आ रहा था उसे उसने देखा था अपने दोस्तों के साथ जब यह हुआ इसका मतलब मेरा भी विवाह तय हो गया मेरा लग्न हो गया मुझसे पूछा भी नहीं ।
पर क्या करता हिम्मत न हुई बोलने की पर मन ही मन रुष्ट था ।
सभी कब जाने के बाद माँ से बोल दिया मुझे न करनी अभी शादी कह देना बापू से।
क्यों न करनी अभी आ रही तो कर मत फिर रोना सर पकड़कर।
हां रो लुंगा।
समझ नही आता तुझे पूरे सोलह साल का हो गया औरों की तो 12 बरस में ही हो जाती है हम फिर भी लेट कर दी कुछ न नुकुर न करना तुझे पढ़ना है पढ़ कोई व्यवधान न होगा तेरे जीवन में।
सुन सारे काम दो दिन में ही निपट जाने हैं फिर दो साल तेरा शुभ मुहूर्त न है ।
सारे काम बड़ी धूमधाम से हुए अकेला बेटा कोई कमी भी न थी ,लड़कीं पास के गाँव से ही थी खूब रौनक लगी लड़कीं की बस दादी थी उसने कोई कमी न छोड़ी खूब वाहवाही हुई भावरों से ही शिवम का मुंह लटक गया एक तो वो अभी विवाह के विपरीत था तैयार भी हुआ तो कैसी दुल्हन मिली पैर से बल खाती वह क्रोध से भर गया , बापू दौलत के लालच में लँगड़ी लड़कीं से मेरा व्याह कर दिया।
उधर बहु के घर आने पर सब प्रसन्न थे सभी रस्में हुईं और आज ही सुहाग सेज भी सजा दी गयी क्योंकि कल पगफेरे होने थे।
सभी दोस्त शिवम को चिड़ा रहे थे बहुत माल मिला है और भाभी तो गजब है अरे जा जल्दी तेरा इंतजार कर रही हैं ।
वह समझ रहा था सब उसका मजाक उड़ा रहे हैं , उसके गुस्से की कोई सीमा न थी बिना कुछ सोंचे घर से निकल पड़ा कभी न आने के लिए।
जब घर में पता चला तो हाहाकार मच गया सारा दोष दुल्हन के सर दे दिया अरे मनहूस है पैदा होते ही माँ बाप को खा गयी अब पति भी छोड़कर चला गया ।
पहुँचा दिया गया उसे बूढ़ी दादी के पास दादी भी यह सदमा सह न सकी 10 दिन बाद स्वर्ग सिधार गयीं , जो भी पैसा था शादी में खर्च हो गया अब क्या करे कहाँ जाए सबके ताने सुनकर कलेजा फटा जाता एक रात पास के रेलवे स्टेशन में सवार हो पहुँच गयी दिल्ली शाम के सात बजे वह जब रेलवेस्टेशन पर उतरी तो घबरा गयी क्या करे कहाँ जाए एक ही रास्ता था किसी आती हुई गाड़ी के नीचे कूद जाए यही सोचकर वो बड़ गयी पटरी की तरफ बहुत तेजी से दूर से गाड़ी आती दिख गयी उसे ।
वो छलाँग लगा दी यह क्या किसी ने मजबूत हाथों में थाम लिया।
अरे छोड़ो मरना है हमें हमारा कोई नहीं।
अरे कोई नही तो क्या मर जाओगी ।
उसने जब लड़कीं को देखा तो उसकी सुंदरता का कायल हो गया अपनी ज़िंदगी में इतनी सुंदर लड़कीं नही देखी आज तक ,
छोड़ो हमें ।
अरे क्यों छोड़े ।
कहाँ जायेंगे हम इस दुनिया में।
अरे जहां हम जाएंगे हमारा भी कोई नहीं हम भी अकेले हैं हम मर गए क्या जिंदा हैं न देखो।
तुम तो पुरुष हो एक औरत और पुरुष की जिंदगी में बहुत अंतर होता है।
कोई अंतर बन्तर नही होता चलो हमारे साथ ।
कहां ।
जहां ले चले और कुछ बोलो मत हमारे में इत्ता दिमाग नही ।
वह चल दी उसके पीछे एक ऑटो पकड़कर झुग्गी की बस्ती में आ गया एक झुग्गी सामने रुक गया ताला खोल कर बोला आ जाओ।
वह घबरा रही थी अरे डर मत आ ।
अन्दर साफ सुथरा कमरा था एक बिस्तर कुछ बर्तन अरे अब ऐसे मत देख क्या नजर लगाएगी मेरे घर को।
चल तू बैठ मै अभी आया वह डर गयी,
अरे डर मत कुछ खाने को ले आऊँ कहकर चल दिया ।
कुछ देर में लौटा तो दो पाव भांजी थी ले खा ले ।
मेरा मन नही।
अरे पहले बताती मेरे पैसे क्यों खर्च कराए यहां तो वैसे भी तंगी है अब तो खाना ही पड़ेगा कहकर वह बाहर जाकर सो गया।
पर रोहणी सारी रात रोती रही अपने भाग्य को कोसती रही ।
सुबह के पहर आँख लग गयी उसे सोता देख वह एकबार फिर रीझ गया पर वह जाग गयी ।
ले चाय पी ले दो चार दिन में तू भी कुछ काम करना ।
पर मैं क्या करूँगी।
यह दिल्ली है यह सबको जीना सिखा देती है, और मरने या भागने का मत सोच मैं भी वक्त का मारा अपनो से धोखा खाया हुआ हूँ, समझता हूं तेरी परेशानी अब मै जा रहा काम पर बराबर में हो एक फैक्ट्री में कोई जरूरत हो तो आ जाना वो देख सामने जो बड़ा दरवाजा है वहीं है।
दोनो को साथ रहते रहते पूरे दो साल हो गए।
दोनों ऐ ओ करके बात कर लेते ।
रोहणी फूल खरीद कर लाती और गजरा बनाके बेंचती ।
एकदिन वह गजरा बना रही थी तभी वो आ गया ।
अरे आज जल्दी आ गए तुम हाँ सर दर्द कर रहा।
तुम इतना काम क्यों करते हो अकेले के लिए।
अकेले नही दो हैं हम।
मैं तो अपना कमाती हूँ हां कमाने लगी है तू तो अरे हमें साथ रहते पूरे दो साल ही गए पता ही चला, तूने अपना नाम न बताया मैने भी पूछा नही नाम क्या है तेरा।
मैने भी कहाँ पूछा तेरा , मेरा नाम रोहिणी है उसे झटका सा लगा सारा दर्द भाग गया ,
क्या हुआ ,
पर वो बात बदल गया।
अच्छा तू क्यों मर रही थी उस दिन।
फिर रोहणी ने जो सुनाया की कैसे उसका पति उसे पहले रात छोड़कर भाग गया सुनते ही शिवम को सब समझ आ गया।
क्या नाम है तेरे गाँव का और पति का।
मेरे गाँव का नाम माधोपुर, पति का नाम शिवम राठौर, अरे काहे का पति बिना बात भाग गया क्या कुछ न दिया मेरे दादी ने बताता तो मेरी कमी क्या थी काश एकबार मिल जाए फिर पूछुं सारा हिसाब बराबर कर दूं मेरे मदमाते यौवन को वे मौसम पतझड़ दे गया उम्र भरका कहकर रो दी।
शिवम का दिल भर आया मन किया जाकर गले लगा ले हक दे मैं ही हूँ मुझे माफ़ कर दे पर चुप हो गया, अच्छा एक बात बता अगर वो आ जाए तेरे सामने तो क्या करेगी ।
बहुत जोर से दो मारूंगी फिर कहूँगी अरे निर्मोही नही करना था विवाह न करता क्यों बसन्ती सपने दिखाकर छोड़ गया मुझे विरह में पतझड़ सा
पीलापन देकर मेरी सुर्खी को मैं तो वैसे भी जन्म से अभागी थी तुझसे ही
आस लगायी तू भी छोड़ गया।
रोहणी तेरा वो अपराधी मैं ही हूँ जो चाहें सजा दे दे पर पहले मेरी बात सुन ले ।
सुनकर वह वहीं बेहोश हो गयी शिवम बड़ी मुश्किल से उसे होश में लाया ।
पहले मेरा जीवन नर्क किया फिर मरने भी न दिया।
पहले मेरी बात सुन तू फिर जो चाहें सजा दे देना दो न दस मार लेना ।
बोल।
मेरा मन नही थी शादी को।
तो पहले ही मना कर देता न ।
अरे सुन तो मेरी माँ पूरी बात।
फिर माँ के कहने पर तैयार हो गया पर जब भांवरो के वक्त तू फेरा लेने मेरे साथ चली तो मैने देखा तो एक पैर से लँगड़ा रही थी बस वहीं मेरा मन उखड़ गया फिर मेरे दोस्तों ने जो मजाक उड़ाया मैं कुछ भी न सोच सका चला आया सब छोड़।
सब सुनकर वो जो हँसी लोटपोट ही गयी।
अरे क्यों हँस रही कुछ बोल तो ।
पर वो पूरा 10 मिनट तक न चुप हुई शिवम चुप होकर बैठ गया लगता है सदमें से पगला गयी, पर जब गया तब न पगलाई फिर अब क्यों ।फिर अचानक उसके पास आकर रोने लगी उसने गले लगाया तो चार पाँच जड़ दिए बोली अरे मूर्ख एकबार पूछ लेता या अपनी माँ से पुछ्वा लेता वो मेरे पैर में मोच आ गयी थी इसलिए लँगड़ा रही थी तेरी एक गलतफहमी ने मेरे कितने बसन्त पतझङ कर दिए ।
वह शरारत से बोला तेरी सारे बसन्त फिर से ब्याज सहित बसन्ती कर दूँगा यह वादा है तेरे बसन्ती पिया का तुझसे सजनी ,और दोनों खो गए एक दूजे में।
अंजू दीक्षित ,
बदायूँ,उत्तर प्रदेश।

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