ऐ बबूल
कटींली डालियों को
रख निज देह पर
सूखे से
तेजहीन
न फल न फूल रखते
क्या देते दुनिया को
कहीं भार तो नहीं
इस धरा पर तुम
बबूल सुन रहा था
वाणी कठोर मेरी
अपने में मस्त
अविचल भाव से
बोला - कौन फलदार पेङ दिखा
इस मरुभूमि में
प्यासा रहकर भी
भूखा रहकर भी
खुद जिंदा हूं
मैं भी चाहता फल फूल
मालिक ने नहीं दिये मुझको
बिना उफ
आंसू बहाये बिना
निष्ठुर सदृश
अपनी छाया से कुछ को बचाता हूॅ
फल तो नहीं
पर ऊंट का पेट भरता हूं
भार नहीं धरा पर
मैं जीकर दिखाता हूं
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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