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समाज !तू कब और कहाँ बना सहायक
और कब बना सारथी सत्य का
मैंने कदम-कदम पर टूटते देखा बेबस पिता को
होकर दंडवत् तेरे आगे और होते हुए मजबूर
अकेलेपन और तिरस्कार के आगे
विवश होते देखा माँ को भी मैंने
मुझे याद है
माँ करती थी कितने जतन
कुरीतियों को बदलने के लिए
वह जब-जब करती थी विरोध
शोषण और अत्याचारों का
तब-तब किया जाता उसे दंडित
हर बार- बार-बार
उसकी उस बेबाकी के लिए
मजबूर किया जाता था उसे
अलग थलग हो लेने के लिए
और तो और इन सबके लिए
पिता को भी चुकाने पड़ते थे पंचों के नतीजे
माँ के साथ-साथ ही
उफ्फ!
कितने कठोर होते थे ना
खाप पंचायतों के वे सामंती फैसले !
जाहिर है- "जिसकी लाठी उसकी भैंस"
××× ××× ××÷
कहाँ गलत थी माँ की वह जिजीविषा
और- औरों के लिए जीना
उसने बेटियों को पढ़ाया
कुप्रथाओं के लिए विरोध जताया
और इन्हीं सबके लिए ही होती रही वह दंडित
क्या प्रेम गीत गाना गलत था उसका !
क्या गलत था उसका
अपने लिए अपने ही अंदाज से जीना
तो फिर-
क्यों किया इस निर्मम समाज ने उसका जीना दूभर
क्यों किया इस कदर घोर उपेक्षित
क्यों इतना संकुचित है यह आततायी समाज
क्यों नहीं समझता यह
संवेदना और सहानुभूति के निहितार्थ
××× ××× ×××
कोई अकेली स्त्री
जब-जब करती है कुछ अनूठे नवाचार- नवसृजन
इन घिसी-पिटी पुरातन परम्पराओं के विरुद्ध
तो यह पितृसत्तात्मक समाज
क्यों नहीं करता उसका स्वागत
जहाँ मिले समान कर्म, भाव और विचार,
जहाँ धर्म, जाति, मज़हब और
ओहदे का ना हो भेदभाव
जहाँ सिर्फ और सिर्फ
हो मैत्री, प्रेम और करुणा का भाव
सहयोग, समता, समानुभूति और सहानुभूति
वहाँ क्यों नहीं उतरता उसके साथ-
कंधे से कंधा मिलाकर
जैसे वह उतरती आई है सदियों से आजतक
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काश !
यही सब मानवीयता का सच्चा अर्थ हो जाता
यही सब समाज का सच्चा धर्म हो जाता
काश...! काश...!! काश...!!!
- मीनाक्षी कुमावत 'मीरा'

1 टिप्पणियाँ
Kaash koi is marm ko samajh paaye.