गुजरात की हृदय विदारक घटना पर दो शब्द....

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दुनियाँ की भीड़ में तुम,
क्यों खोई आयशा।
अपनों की ज़िल्लतों से,
क्यों रोई तू आयशा।

फ़ितरत है ये इन्सान की,
अपनो से धोखा करना।
पल पल हमें तड़पाकर,
गिरगिट सा रंग बदलना।

किया था प्यार तुमने,
दिल और जान से।
अर्पण किया था अपना,
सब कुछ ईमान से।

जिस पर लुटाया अपना,
जीवन ओ आयशा।
हक़दार ना था जालिम,
वो तेरे प्यार का।

खाती रही तुम धोखा ,
नजरों के सामने।
आया नहीं वो जालिम,
तेरा हाथ थामने।

खाई थी चोट गहरी,
तूने दिल पे आयशा।
महसूस हो रही मुझे,
तेरी हर आह आयशा।

ये माना आयशा कि,
ना खुदखुशी आसान।
होता है जीना मुश्किल,
और मरना आसान।

पानी में जाने कैसे तूने,
छलांग लगाई होगी।
उस पल में आयशा तूने ,
बड़ी हिम्मत जुटाई होगी।

मासूम थी तुम कितनी,
क्यों समझी ये चाल।
ज़ालिम ने था बिछाया,
धोखे का एक जाल।

क्यों फंस गई तू उसमें,
क्यों दे दी अपनी जान।
माँ बाप पे क्या गुजरेगी,
क्यों ना सोचा मेरी जान।

सिखाना था सबक उसको,
तू सुन री आयशा।
ना देना था उसको मौका,
फिर से आयशा।

पापियों की सजा क्यों,
भोगते हैं निर्दोष।
मुश्किल घड़ी में जाने ,
क्यों खो बैठते होश।

क्यों जीत गई जीवन से,
मौत फिर से एकबार।
एकबार फिर घृणा से,
क्यों हार गया प्यार।

हर ओर छा रही अब,
कलयुग की काली छाया।
मक्कारों की मक्कारी ने,
दिखाई है अपनी माया।

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                 सपना (स. अ.)
                 जनपद-औरैया