दिनों का क्या वनपंखी की तरह उड जाते है''
रह जाती है ,सिर्फ भूली बिसरी यादें"
कितना कुछ गवायाँ,'कितना कुछ कमाया "
फिर भी ,हिस्से मे आयी बेरोजगारी"
चंद सिक्को मे ,बिक गये कुछ मेरे अपने"
मूक बनकर ,देखती रही मै नम आँखो से"
और बंद हो गये ,मेरे लिऐ सख्ती से वो पट"
जिनके ऊपर बने ,रोशनदानो से झाँकती,
धुधँली सी कुछ ,परछाईयाँ "जो अहसास,,
दिल जाती है,खमोशी का ,टूटते ज्जबातों,
की नुकीली,नश्तर चुभोती पीडा का सजीवता"
वेदना से भर उठता है मन,फिर एक दुत्कार"
समेट लेती है ,खुद को वो कमजोर स्त्री"
फिर अंर्त मन से गूँजती है,एक आवाज"
उठ मत निराश हो, समय आ गया बदलाव का"
जैसे पानी मे समायी,रेत से निकल कर जीव"
जी लेते है अपनी जिन्दगी,वैसे ही तू भी जी ,
अपना जीवन,सबसे परे हट"तोड बेडिया,
भर अपनी उडान, आ गया एक नया सवेरा,
नया जीवन,नया हौसला,नया बदलाव-----
रीमा महेन्द्र ठाकुर (लेखिका)
रानापुर झाबुआ मध्यप्रदेश भारत
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