हम पिंजरे का 'शेर' नहीं,
मैं जंगल का 'सरदार' हूँ...
बाँध लिये पट्टी 'माथे' पर,
बन जाऊँ 'हथियार' हूँ...


राह देख 'जंगल' आग उगली है,
आंधी भी राह न रोंके...
कुदरत की राह,आसान नहीं है,
सुलग रही अंगार है...


सौगातों से ऊँची 'अरमानें',
ना अधूरा टूटने देंगे...
जीतूँगा हर हाल में 'सपने' को,
सर ताज़ को ना झूकने देंगे...


        लेखक:-विकास कुमार लाभ
                        मधुबनी(बिहार)