"अब तो आओ हृदय चाहता है सनम
मेरे नज़रों को नजरों से पैगाम दो।
कब से लंबित है मेरी प्रणय याचिका,
मेरे हृदय में जरा सा आराम दो।।
मन से भावों के बंधन, सभी खोल कर,
आज मुझको गले से लगाओ प्रीतम।
दूरियां बीच की सब निलंवित करो,
तोड कर सारे बंधन पास आओ प्रीतम ।।
मेरे नज़रों से अब तुम मिला कर नजर,
प्यार को आओ तुम आज अंजाम दो।
कब से लंबित है मेरी प्रणय याचिका,
मेरे उर के लिए आओ आराम दो।।
तन से तन दूर अपने भले है मगर,
मन से मन जोड़ कर, एक हो जाए हम।
आओ सपनों की मीठी डगर पर चलें,
एक दूजे की यादों में खो जाएं हम।।
तुम हो अराध्य और, मैं हूँ अर्धांगिनी,
इस मोहब्बत को अब तो कोई नाम दो।।
कब से लंबित है मेरी प्रणय याचिका,
मेरे उर के लिए आओ आराम दो।।"
अंबिका झा ✍️

6 टिप्पणियाँ
मन के भावों को झकजोर कर दिया आपने