एक अनबूझ पहेली
एक अनकही कहानी हूँ
मैं
मैं नारी हूँ
समां की तरह जलना ही फितरत है मेरी
जलती रही मैं
तुम्हारे जीवन के अँधेरे मिटाने
मगर यह क्या
वह तम सिमटा और मेरे ही पाँवों से ही जा लिपटा
समां के धागे सी मेरी आत्मा तिल तिल जलती हुई
अँधेरों को चीरती रही
मैं पिघलती रही
और जमाने की इच्छापूर्ति के लिए
अनेकानेक रुपों में जमती रही
कहीं माँ
कहीं बहन तो कहीं पत्नी
और कभी प्रेमिका के रूप में
किसी के दिन तो
किसी की रातें रोशन करती
मिटाती आई हूँ अस्तित्व अपना
और जमाना
मतलब चुकते ही
बड़ी ही बेरहमी से मेरा गला घोंटता रहा
कभी मुझे मां की तरह पूजाघर में सजाया
तो बहन की तरह आँगन में
प्रेमिका की तरह मुंड़ेरों पर
तो कभी पत्नी की तरह
अपने अन्तःपुर की शोभा बनाया
और आवश्यकता चुकने पर
किसी मजार को सौंप पल्ला झाड़ छोड़ दिया मुझे
दुनियाँ के थपेड़े खाने
और मैं
अाँधी तूफान में थपेड़े खाती
अकेली भटकती रही
मैंने तो तुम्हारे संसार को खुशियों से भर दिया था
तुम्हारी शाखों को
महकते गुलों से भर दिया
तुम्हारी अँधेरी रातों को उजालों को तोफा दिया
नीरस जीवन में बसन्त सी बहारें लायी
फिर क्यों
आखिर क्यों
किस गुनाह की सजा दी मुझे
फाँसी से पहले एक बार गुनाह तो बताया होता मेरा
चुप क्यों हो
क्या बस यही गुनाह था मेरा
बस यही
कि मैं नारी थी।
देवयानी भारद्वाज
उसायनी फीरोजाबाद

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