कितनी अजीब बात है न, बात एक ही होती है पर नजरिए जुदा होते हैं। कई बार कलम उठाई .... फिर रख दी मन में यही आया कि मेरी अपनी सोच मेरा अपना नजरिया है ,लोग कहीं इसे अपने नजरिए की आलोचना न समझ लें, मगर कहते हैं न जो कोशिश से लिखी जाए असल में वो कविता नहीं होती, महज़ शब्दों की तुकबंदी होती है.... जो बात हमारे अंदर होती है हमारी कलम चाह कर भी उसे अपने अंदर नहीं रख सकती 🙏 ....खैर मैं जो लिखने जा रही हूं उसमें बस मेरा अनुभव शामिल है कृपया कोई भी इसे किसी तरह की आलोचना न समझे। 🙏🙏😊
मैंने अक्सर लोगों को देखा है , प्रेम की अलग अलग परिभाषाएं देते हुए , अक्सर ही लोगों ने शिव और माता सती के प्रेम को पूर्ण प्रेम की संज्ञा दी है और राधे कृष्णा के प्रेम को अधूरा कहा है ।
जहां तक मेरा अपना दृष्टिकोण है , प्रेम तो केवल एक भावना है जो हमारे ह्रदय के उपवन में पल्लवित होती है और भावना में क्या अधूरा और क्या पूरा ?
प्रेम की असली परिभाषा तो आज तक कोई दे ही नहीं पाया , ये तो एक सागर है जिसकी गहराईयों को नाप पाना आसान नहीं।
प्रेम बस प्रेम होता है, जो करने के लिए होता है ये खोने पाने जैसी तुच्छ बातें तो कहीं पीछे छूट जाती हैं ।
सच्चे प्रेम की पराकाष्ठा ही यही है कि उसमें त्याग की भावना भी उतनी ही बलवती होती है जितनी कि प्रेम की भावना।
फिर चाहें वो शिव और माता सती का प्रेम हो, राधे कृष्णा का प्रेम हो या मीरा बाई का प्रेम हो।
प्रेम सदैव पूरा होता है अपने आप में एक पूर्ण भावना होती है इसमें अधूरे जैसे किसी शब्द का कोई अस्तित्व ही नहीं होता ।
"विष क्या होता है, भोलेनाथ से पूछो 😊
अब मीरा से पूछोगे तो अमृत ही कहेगी"....🙏
..........खैर.....🙏🙏
मैं तो बहुत अदनी सी कलमकार हूं "प्रेम"जैसे जटिल और सरल विषय पर कुछ लिख सकूं मेरी लेखनी में इतनी योग्यता नहीं 🙏🙏 बस अपने विचारो को शब्दों में प्रस्तुत किया है।
अंत में कुछ पक्तियाँ ......
"अपनी अपनी
कहानी है जनाब
कोई मोहब्बत करता है,
तो कोई इबादत करता है।
कोई पा लेने को तरसता है,
तो कोई बस दीदार को मरता है।
...........✍🏻🙏🏻🥀🌻🌺 ऋतु बाजपेई

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