पेट की भूख शांत नहीं कर सकती बातें
कुछ सुनाई नहीं देता जब कुलबुलाती आतें
इस रोटी की ही खातिर तो
इंसान रात - दिन एक कर देता ।
फैशन नहीं, इज्जत की बात है
कपड़ा ही तो छुपाता लाज है
स्त्री - पुरुष का कोई भेद नहीं
यह ना हो इज्जत तार-तार है ।
चारदीवारी और एक छत
यही तो होता है एक घर
इसकी चाहत में इंसान
हाड़ तोड़ करता है काम ।
रोटी, कपड़ा और मकान
यह हों हर एक के पास
फिर न करें कुछ ओर दरकार
बस ईश्वर से यही अरदास ।
धनु दयाल

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