नित करता अभ्यास एकलव्य,
बिना गुरु के ज्ञान नहीं...
है ,अधिकार शिक्षा पर सबका,
पर देना स्वीकार नहीं...
दिया वचन कर संकल्प ,
राजा का बेटा राजा है...
जात पात व्यर्थ का अंकुश,
एकलव्य फिर वंचित है...
नित अभ्यास ही बना प्रयास,
जब ज्ञान का सूर्य उदय हुआ...
समय कालचक्र का पहिया,
धीरे-धीरे आगे चला...
अर्जुन से श्रेष्ठ धनुर्विद्या,
एकलव्य फिरर सफल हुआ...
लक्ष्य द्रोण की बना प्रतिमा,
ऐसी लगन उस साधक की...
एक दिन भ्रमण के कारण अर्जुन,
द्रोण की टोलि आ पहुंची...
संग में कुत्ते की कर्शक वाणी,
एकलव्य की हिंदू बाद्या बनी...
पलट दिया फिर लगा निशाना ,
कुत्ते का मुंह बंद किया....
धीरे-धीरे यह दृश्य देख परिचय,
एकलव्य तक आ पहुंचा...
कोन गुरु किस के शिष्य,
गुरु द्रोण ने पूछ लिया...
गुरु द्रोण के शिष्य एकलव्य ,
सम्मुख उनकी मूरत है...
समझ गए फिर नियति इशारा,
नहीं संभान इसके कोई द्वारा...
बिना संकोच सोचे समझे ,
मेरी अभिलाषा करनी होगी...
गुरु कहां तो गुरु दक्षिणा,
एकलव्य तुम्हें देनी होगी...
मांग बैठे गुरु द्रोण अंगूठा दाएं,
हाथ का एकलव्य से...
वचन दिया था अर्जुन को ही ,
धनुविद्या में सर्वश्रेष्ठ का...
इस इस कारण एकलव्य,
है प्रतिस्पर्धा का...
बिना संकोच गुरु चरणों में ,
द्रोण को गुरुदक्षिणा देता है...
काट दाएं हाथ का अंगूठा एकलव्य,
खुश होता है...
एकलव्य सा शिष्य दूजा,
इतिहास में नहीं होगा...
🙏लक्ष्मीनारायण ठाकुर
देवरी जिला सागर मध्य प्रदेश।

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